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टिप्पणी
Carnegie India

जोखिम भरी डगर: भारत-चीन सीमा विवाद के मद्देनज़र भूटान की कूटनीतिक चुनौती

इस आलेख में चीन के साथ सीमा विवाद के मद्देनज़र भूटान के कूटनीतिक प्रयासों के सामरिक निहितार्थों का अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन उस पेचीदा स्थिति पर प्रकाश डालता है जिसमें भूटान के समक्ष महत्वपूर्ण संबंधों को जोखिम में डाले बिना समाधान हासिल करने की चुनौती है।

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द्वारा शिबानी मेहता
पर प्रकाशित 23 मई 2024
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परियोजना

सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम

सिक्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा में भारत की तेज़ी से विकसित होती भूमिका पर जटिल समीकरण असर डालते हैं। सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम के विशेषज्ञ इस विश्व व्यवस्था में भारत की हैसियत की समीक्षा इसकी विदेश और सुरक्षा नीतियों के विश्लेषणों के माध्यम से करते हैं, जिसमें खास तौर पर ध्यान चीन के साथ संबंध, सीमाओं की सुरक्षा और हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति पर दिया जाता है।

और अधिक जानें

अक्टूबर 2023 में भूटान के विदेश मंत्री टांडी दोरजी ने बीजिंग की यात्रा कर अपने चीनी समकक्षी वांग यी से मुलाकात की। दोनों देशों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, इसलिए यह यात्रा कई अर्थों में महत्वपूर्ण थी। यह दोरजी का पहला आधिकारिक चीन भ्रमण था और ऐसा दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता के पच्चीसवें चरण के मौके पर हो रहा था। पच्चीसवें चरण की वार्ताका महत्व इसलिए भी ज़्यादा था क्योंकि यह आठ साल बाद हो रही थी। चौबीसवें चरण की वार्ता 2016 में हुई थी। वार्ता के बाद चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्य में उम्मीद जताई गई थीकि दोनों पक्ष जल्द ही कूटनीतिक संबंध स्थापित करेंगे तथा सीमा वार्ता को पूरा करेंगे।

70 सालों से जारी विवाद के जल्द निबटारे की इस ताज़ा जद्दोजहद का भूटान, चीन और भारत के लिए सामरिक महत्व है। भूटान और भारत की मित्रता का इतिहास 1949 से शुरू होता है और भूटान के विदेश और रक्षा नीति संबंधी विषयों में भारत उसका मार्गदर्शन कर सकता है। वहीं, चीन की भूटान के साथ सीमा वार्ताओं को पूरा करने की इच्छा भारत-चीन सीमा विवाद से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है, खासकर, अरुणाचल प्रदेश की स्थिति के चलते जिसके बारे में चीन का दावा है कि वह दक्षिण तिब्बत का विस्तारित क्षेत्र है।

परिणामस्वरूप, भूटान के समक्ष एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है कि कैसे वह ऐसा बारीक संतुलन स्थापित करे, ताकि कोई बड़ी रियायत वह चीन को न दे दे, जिससे भारत उससे दूर हो जाए या चीन को फायदा लेने का प्रोत्साहन मिले। यह आलेख उस पेंचीदा स्थिति पर प्रकाश डालता है, जहां भूटान के सामने महत्वपूर्ण संबंधों को ख़राब किए बिना समाधान हासिल करने की चुनौती है।

विवाद का कारण

भूटान और चीन के बीच 477 किलोमीटर लंबी सीमा है। 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लेने के बाद चीन की दक्षिण सीमा का और विस्तार हो गया। इस स्थिति ने न केवल भूटान की क्षेत्रीय अखंडता को खतरे में डाला, बल्कि इस आशंका को भी हवा दी कि चीन की सेना शत्रुतापूर्ण रूप से घुसपैठ के प्रयास करेगी।

सीमांत रेखा में उपरोक्त परिवर्तन के बाद से ही भूटान के भीतर के दो क्षेत्रों पर चीन ने अपना दावा जारी रखा है-- उत्तर में पासमलुंग और जाकरलुंग (तिब्बत के क़रीब) और पश्चिम में डोकलाम जिसमें सिंचूलुंग, द्रमाना और शाखाटोइ शामिल हैं। अपने इन दावों के समर्थन में 1950 के दशक में चीन ने जो मानचित्र प्रकाशित किए, उनमें भूटान के इन क्षेत्रों को चीन का हिस्सा बताया था। समय-समय पर चीन ने प्रत्यक्ष सीमा वार्ता शुरू करवाने के मकसद से भूटान के इलाकों में घुसपैठ को टैक्टिक्स की तरह इस्तेमाल किया है। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि 1979 में चीन की घुसपैठ उससे पहले के सालों की घुसपैठ के मुकाबले "बड़े स्तर की थी",ताकि वार्ता की आवश्यकता को रेखांकित किया जा सके। हालांकि उसके पांच साल बाद जाकर ही,1984 में, दोनों देशों ने बैक चैनल वार्ता की, जिसकी व्यवस्था भारत स्थित भूटान दूतावास ने की थी।

जारी बातचीतका आधार दो संधियां हैं। एक है 1988 की संधि जिसमें सीमा मामलों के निबटारे के लिए दिशा-निर्देशक सिद्धांत बताए गए हैं; और दूसरी है 1998 की संधि, जो भूटान-चीन सीमा पर शांति और स्थिरता को बनाए रखने पर केंद्रित है।

1996 में दोनों पक्षसहमति के करीब पहुंच गए थे। उस वक़्त चीन ने प्रस्ताव दिया था कि वह पासमलुंग और जाकरलुंग की ओर अपने दावे वाला 495 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्रछोड़ने को तैयार है, यदि उसके बदले में डोकलाम और उसके आसपास-सिंचूलुंग, द्रमाना और शाखाटोइ- का 269 स्क्वायर किलोमीटर चीन को सौंपने के लिए भूटान राजी हो जाए।चार साल तक चली वार्ता के बाद चीन और भूटान 2001 में इस आदान-प्रदान के एकदम करीब पहुंच गए थे, किंतु यह आदान-प्रदान नहीं हो सका क्योंकि भारत ने भूटान को अपनी सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर आदान-प्रदान से पीछे हटने के लिए राजी कर लिया। डोकलाम पठार पर चीन की उपस्थिति उसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर को लक्षित करने की संभावित सामरिक स्थिति उपलब्ध कराती है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली जमीन की एक संकरी पट्टी है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ती है। नतीजतन, भूटान और चीन के मध्य किसी भी प्रकार के भौगोलिक आदान-प्रदान को चीन द्वारा भारत के ख़िलाफ़ सामरिक श्रेष्ठता हासिल करने के रूप में देखा जाता है।

बातचीत में दूसरा उल्लेखनीय विकास 2021 में हुआ, जब भूटान और चीन सीमा वार्ता को "सफलता के साथ दोनों पक्षों के लिए मंजूर स्थिति में पूरा करने" के उद्देश्य से, तीन-स्तरीय रोड मैप परसहमति हुए। सहयोग संधि, जो पच्चीसवें चरण की वार्ता का एक महत्वपूर्ण हासिल है, एक संयुक्त टेक्निकल टीम के गठन के लिए शर्तें निर्धारित करती है, जो सीमा-निर्धारण (सरहदबंदी) पर काम करेगी। हाल की गतिविधियां भूटान के पिछले तीन सालों के उन प्रयासों पर प्रकाश डालती हैं, जो उसने चीन के साथ विवाद के जल्द समाधान के लिए किए हैं। टिप्पणीकार इस जल्दबाजी को जून 2020 से जोड़कर देखते हैं, जब चीन ने भूटान को प्राप्त होने वाला विकास सहयोग, जो साकतेंग वन्यजीव अभयारण्य के लिए था, वीटो कर दिया था। इस740 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र का जिक्र पिछले 24 चरणों की वार्ता में कभी नहीं हुआ था। चीन के इस कदम को भूटान को छेड़ने जैसा माना गया, ताकि वह प्रत्यक्ष सीमा वार्ता शुरू करने के लिए सहमत हो जाए। साथ ही भूटान और भारत के सहजीवन संबंध के मद्देनज़र चीन के उपरोक्त कदम को भारत लक्षित उसकी सामरिक पैंतरेबाजी के रूप में भी समझा गया।

डोकलाम ट्राइ जंक्शन

2017 में भूटान ने चीन पर आरोप लगाया कि वह एकतरफा सीमा यथास्थिति को बदलने का प्रयास कर रहा है, जब यह साफ़ हो गया कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेभूटानी सेना के ज़ोम्पेलरी स्थित सैन्य कैंप की ओर मोटरयोग्य सड़क का निर्माण करना आरंभ किया है। इससे पहले चीन ने इस क्षेत्र में कच्ची सड़क से अधिक कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बनाया था। भूटान ने 1988 और 1998 के समझौते का हवाला देते हुए इस बात पर जोर किया दिया कि दोनों पक्षों की प्रतिबद्धता, जब तक की विवादों का निपटान नहीं हो जाता, सीमाई इलाकों पर शांति बनाए रखने की है। चीन ने जोर दिया कि डोकलाम में सड़क का निर्माण उसने अपनी संप्रभुता के अधिकार के तहत किया है, क्योंकि डोकलाम "प्राचीन समय से ही चीन का हिस्सा रहा है" और यह "निर्विवाद तथ्य ऐतिहासिक और न्यायिक साक्ष्यों द्वारा समर्थित" होने के साथ ही जमीनी हकीकत द्वारा भी साबित है। भूटान की निंदा के बावजूद चीन ने डोकलाम में भारत-भूटान-चीन ट्राइ जंक्शन केपास निर्माण गतिविधियों को चालू रखा,जिसके चलते देशों के बीच तनाव पैदा हुआ। यह तनाव भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच चले 73 दिनों के सैन्य गतिरोधका कारण बना, जो अगस्त 2017 में समाप्त हुआ, जब दोनों पक्ष पीछे हटने के लिए सहमत हुए।

यदि भूटान की मंशा भारत-चीन प्रतिस्पर्धा से ख़ुद को अलग रखने की रही भी होगी, तो 2017 के गतिरोध ने भूटान को इस प्रतिस्पर्धा के केंद्र में लाकर रख दिया। पिछले साल एक इंटरव्यू में भूटान के पूर्व प्रधानमंत्री ने बताया था कि ट्राइ जंक्शन में विवाद द्विपक्षीय मामला नहीं है। उन्होंने कहा था, "यह केवल भूटान पर निर्भर नहीं करता कि मामला निपट जाए। हम लोग तीन पक्ष हैं। कोई भी देश छोटा या बड़ा नहीं होता, सभी तीनों देश बराबर हैं और इस मामले में हर देश की एक तिहाई हिस्सेदारी है।"1 चीन के सरकारी मीडिया ने उनकी इस टिप्पणी का इस्तेमाल यह दावा करने के लिए किया कि भारत सीमा विवाद के निबटारे में मुख्य अवरोध है।

निहितार्थ

2017 के डोकलाम गतिरोध बाद भूटानी शिक्षाविदों, वरिष्ठ नौकरशाहों और सांसदों के मध्य इस विचार ने व्यापक रूप से मान्यता पाई है कि केवल डोकलाम नहीं बल्कि चीन के साथ सीमा विवाद को संपूर्णता में हल करना सबसे ज़रूरी प्राथमिकता है। हालांकि चीन के साथ द्विपक्षीय समाधान प्राप्त करने की गुंजाइश बहुत कम है। ऐसा इसलिए कि इस मामले में डोकलाम भी शामिल है। भूटान और चीन के बीच उत्तर (पसामलुंग और जंपारलुंग घाटियां) और पश्चिम (डोकलाम) के मध्य के इलाकों के आदान-प्रदान का कोई भी संभावित समझौता भारत के सरोकार का विषय है। यह पठारट्राइ जंक्शन क्षेत्र के दक्षिण-पूर्व पर है। विशेषज्ञों के अनुसार, डोकलाम का भूटान के नियंत्रण में रहना भारत को चीन के ख़िलाफ़ महत्वपूर्ण लाभ उपलब्ध कराता है। इस स्थिति में सिक्किम से चीन के ख़िलाफ़सामरिक आक्रमण और काउंटर ऑफ़ेंसिव दांव-पेंच की क्षमता भारत को हासिल रहती है। इसलिए ट्राइ जंक्शन का कोई भी समाधान भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा विवाद पर गंभीर असर डालेगा। 2020 की गलवान घाटी घटना के बाद भारत और चीन पहले से ही पूर्वी लद्दाख में आमने-सामने की स्थिति में हैं।इससे तनाव में बढ़ोत्तरी हुई है और सीमा विवाद व्यापक द्विपक्षीय संबंधों में उलझ गया है।

भूटान को अहसास है कि वह प्रतिस्पर्धी हितों के तूफान में नाव को चलाने की कोशिश कर रहा है। पच्चीसवें चरण की वार्ता के तुरंत बाद भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक आठ दिवसीय भारत भ्रमण पर पहुंचे। इस भ्रमण में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की। मार्च 2024 में, भूटान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे अपनी पहली विदेश यात्रा पर भारतआए। इन यात्राओं को भूटान द्वारा भारत को इस बात के लिए आश्वस्त करने के रूप में देखा जा सकता है कि वह सीमा विवाद का व्यापक द्विपक्षीय संबंधोंसे जुड़ाव के प्रति सचेत है और यह भी कि वह भारत और चीन दोनों को समाधान की प्रक्रिया में शामिल देखना चाहता है।

हालांकि भारत को वार्ता प्रक्रिया में शामिल करना भूटान को भारत-चीन संबंध की व्यापक हदों के भीरत अपनी विदेश नीति पर टिके रहने की बहुत कम गुंजाइश देता है जबकि भूटानी राजनयिक इस विवाद को सुलझाने के लिए मेहनत कर रहे हैं, यह ज़रूरी है कि वे ऐसी प्रस्ताव लाएं जिस पर भूटान, भारत और चीन सहमत हो सकें, ताकि यथास्थित बहाल रहे और अतिरिक्त अतिक्रमण से बचा जा सके।

शिबानी मेहता
सीनियर रिसर्च एनालिस्ट, सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम, कार्नेगी इंडिया
शिबानी मेहता
Foreign Policyसुरक्षाSouth AsiaIndiaपूर्व एशियाचीन

कार्नेगी सार्वजनिक नीति मुद्दों पर संस्थागत पद नहीं लेता; यहाँ व्यक्त विचार लेखक(ओं) के हैं और जरूरी नहीं कि वे कार्नेगी, उसके कर्मचारियों या ट्रस्टियों के विचारों को दर्शाते हों।

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