कोणार्क भंडारी
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खरीदें नहीं, बनाएं: सेमीकंडक्टर की वह सीख जो भारतीय AI एक्सपर्ट्स को लेनी चाहिए
जैसे-जैसे एआई और ज़्यादा जटिल होता जा रहा है, इसे चलाने वाली सप्लाई चेन पर नियंत्रण की होड़ बढ़ती जा रही है, और फ्रंटियर एआई मॉडल्स तक पहुंच अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनती जा रही है, भारत को अब अलग तरह के सवाल पूछने शुरू करने होंगे। ऐसे सवाल नहीं कि हम किसी और के बनाए इंफ्रास्ट्रक्चर पर कौन से ऐप्लिकेशंस बना सकते हैं, बल्कि ऐसे सवाल कि दुनिया को, शायद अब से कुछ साल बाद, ऐसी किस चीज़ की ज़रूरत होगी जिसे बनाने की स्थिति में हम हो सकते हैं, लेकिन जिस बारे में हमने अभी तक सोचा भी नहीं है।
जब इतिहासकार 2020 से शुरू हुए भारत के प्रौद्योगिकी दशक के बारे में लिखेंगे—जिसे भारत सरकार ने “टेकेड” (Techade) नाम दिया है—तो शायद वे एक विडंबना का जिक्र करें। सरकार का वो मिशन, जिसे सबसे मुश्किल औद्योगिक चुनौतियों में से एक का जिम्मा सौंपा गया था—यानी ग्लोबल सेमीकंडक्टर कंपनियों को भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने के लिए राज़ी करना—उसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे ज़्यादा ग्लैमरस ब्रीफ़ वाले मिशन से बेहतर प्रदर्शन कर दिखाया, वो भी खामोशी के साथ। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) ने कोई चांद तोड़कर लाने जैसा वादा नहीं किया था। उसने चिप्स, क्लीनरूम और प्रतिबद्ध पूंजी का वादा किया था. और उसने ये वादा पूरा करके दिखाया।
आज, गुजरात में माइक्रोन की असेंबली और टेस्ट फैसलिटी कमर्शियल लेवल पर प्रोडक्शन शुरू करने के लिए करीब-करीब तैयार है। असम में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का पैकेजिंग प्लांट भी इसी चरण में है। LAM रिसर्च और एप्लाइड मैटेरियल्स ने अपने उपकरणों को लगा दिया है। धोलेरा के टाटा-PSMC फैब — जो भारत का पहला कमर्शियल मेगा-फैब है — ने हाल ही में ASML के साथ एक करार पत्र (MoU) पर दस्तखत किए हैं और यह ASML के लिथोग्राफी उपकरणों को सक्रिय रूप से “तैनात” करने की दिशा में काम कर रहा है। यह एक ऐसी उपलब्धि है, जो भारत को उन देशों की बेहद छोटी लिस्ट में शामिल कर देती है, जिन पर डच प्रिसीज़न-ऑप्टिक्स कंपनी ASML अपनी मशीनों के लिए भरोसा करती है। टाटा-ASML का यह MoU इससे कहीं ज़्यादा अहम सिग्नल भी देता है: सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम अब ऐसे भागीदारों को खींच रहा है, जो केवल मौजूदा मांग के पीछे नहीं जाते, बल्कि आने वाले वक्त की मांग का पहले से अनुमान लगाते हैं। भारत के हालिया और आने वाले मुक्त व्यापार समझौते (FTA) सेमीकंडक्टर एक्सपोर्ट को नए बाज़ारों तक पहुंचाने के लिए और मदद कर सकते हैं। साथ ही, ये समझौते पूरी सप्लाई चेन में ज़्यादा किफायती इनपुट भी सुनिश्चित कर सकते हैं।
इसकी तुलना मार्च 2024 में भारत की यूनियन कैबिनेट से मंजूर किए गए इंडिया AI मिशन (IAM) से करें, जिसके लिए ₹10,372 करोड़ का बजट रखा गया था। इसका एक बड़ा हिस्सा, करीब ₹4,568 करोड़ कंप्यूट क्षमता विकसित करने के लिए रखा गया था। कागज़ पर देखें तो लक्ष्य पूरे ही नहीं हुए, बल्कि उनसे आगे भी निकल गए। शुरुआत में 10,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) का लक्ष्य रखा गया था, जबकि 2025 के अंत तक भारत ने लगभग 38,000 GPUs एसेंबल कर लिए थे। इसे असल तरक्की कहा जा सकता है और IAM को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। लेकिन ईमानदारी से, और अच्छी नीयत के साथ, यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या GPUs हासिल कर लेना वाकई में AI का भविष्य बनाने के बराबर है। ISM का नज़रिया IAM से अलग भी है। ISM ने इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स की एक छोटी-सी टीम तैयार की और सीधे काम शुरू कर दिया। ISM की तरफ से जारी ऐसा कोई वर्किंग पेपर या कॉन्सेप्ट नोट ढूंढ़ना मुश्किल होगा, जिसमें बताया गया हो कि वह क्या करने वाला है। उसने बस काम करके दिखाया, वैल्यू चेन के करीब-करीब हर हिस्से में। IAM के सामने भी AI वैल्यू चेन की कई परतों को लेकर उतनी ही चुनौती भरी जिम्मेदारी है। उसका आधिकारिक उद्देश्य है: “कंप्यूटेशनल रिसोर्सेज़ तक पहुंच को आसान बनाना, डेटा की क्वालिटी में सुधार करना, स्वदेशी AI क्षमताओं को बढ़ावा देना, बेहतरीन प्रतिभाओं को आकर्षित करना, रिस्क कैपिटल के जरिए स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना, इंडस्ट्री के साथ साझेदारी को प्रोत्साहित करना, सामाजिक प्रभाव वाले AI प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देना और AI के नैतिक विकास और इस्तेमाल को सुनिश्चित करना।” तो इन पैमानों पर IAM ने कैसा काम किया है, और खास तौर पर, “कंप्यूटेशनल रिसोर्सेज़,” “डेटा की क्वालिटी में सुधार” और “स्वदेशी AI क्षमताओं को बढ़ावा देने” जैसे मकसद पर वो कितना आगे बढ़ा है?
2025 से, भारत सरकार एआई पर केंद्रित कई श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) जारी कर रही है। सबसे पहले, जनवरी 2025 में प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) ने एआई गवर्नेंस से जुड़ी गाइडलाइंस पर एक रिपोर्ट जारी की। इसके बाद, नवंबर 2025 में सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एआई गवर्नेंस पर एक दस्तावेज़ जारी किया। दिसंबर 2025 में, PSA ने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच को आसान बनाने पर एक व्हाइट पेपर जारी किया। इसके बाद एआई गवर्नेंस के लिए एक टेक्नो-लीगल नज़रिए पर व्हाइट पेपर जारी किया गया (जिसे कानूनी उपकरणों, नियम-आधारित कंडीशनिंग, रेगुलेटरी ओवरसाइट और टेक्निकल एनफोर्समेंट मैकेनिज्म के इंटीग्रेशन के तौर पर परिभाषित किया गया था। टेक्निकल आर्किटेक्चर के साथ इसे जोड़ा भी जाना था)। हाल ही में, PSA ने मार्च 2026 में स्वदेशी फाउंडेशनल मॉडल्स को आगे बढ़ाने पर एक व्हाइट पेपर जारी किया। ये सभी मल्टी-स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन प्रोसेस से मिले अहम नतीजे हैं। हालांकि, यह जानना दिलचस्प है कि इनमें से ज़्यादातर पेपर्स में कंप्यूट का ज़िक्र सिर्फ़ हासिल करने के लिए किया गया है, बनाने या मैन्युफैक्चर करने के लिए नहीं।
अनुमान किसी ने जिसकी परख नहीं की
पहली बात, कई हलकों में यह दलील पहले ही दी जा चुकी है कि पूरी एआई वैल्यू चेन के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चुनौती भरा हो सकता है। सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि एआई ताक़त बनने की ख्वाहिश रखने वाले किसी भी देश के सामने मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और संसाधनों की सीमाएं बड़ी रुकावट साबित होंगी। इसके अलावा, पूंजी की कमी से जुड़ी दिक्कतें भी हैं, जिन्हें भारत के कुछ प्रमुख टेक उद्योगपतियों ने स्वीकार किया है। इन सभी वजहों ने इस बात पर व्यापक बहस शुरू की है कि भारत को एआई के किस वर्टिकल पर फोकस करना चाहिए और इसके लिए किस तरह के तालमेल की ज़रूरत होगी। यह बहस मुख्य तौर पर एप्लिकेशन लेयर के पक्ष में रही है, यानी वैसे एप्लिकेशन जिनका लोग वास्तव में इस्तेमाल करते हैं, न कि उनके पीछे की एआई तकनीक। इस साल की शुरुआत में भारत सरकार ने एक औपचारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया था कि भारत अलग-अलग सेक्टरों में एआई एप्लिकेशंस लागू करने की “एआई डिफ़्यूज़न” रणनीति अपना रहा है।
लेकिन, भारत की एआई स्ट्रैटेजी में एक ऐसा अनुमान शामिल है जो इतना सहज है कि इस पर शायद ही कभी सवाल उठाया गया हो: कि ग्लोबल एआई सप्लाई चेन तक पहुंच आसान है, और रहेगी। कि भारत विदेश से कंप्यूट खरीद सकता है, ज़्यादातर कहीं और ट्रेन किए गए मॉडल इस्तेमाल कर सकता है, और उसके ऊपर भारतीय एप्लिकेशन लगा सकता है, और यह व्यवस्था हमेशा के लिए बनी रहेगी।
हो सकता है ऐसा न हो। दो घटनाएं इस बात को साबित करती हैं।
पहली घटना, एआई डिफ़्यूज़न के लिए जो बाइडन प्रशासन के जनवरी 2025 फ्रेमवर्क के तहत, संस्थानों या देशों को सामूहिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा कि वे कितने एआई चिप्स इंपोर्ट कर सकते हैं। इन प्रतिबंधों से अठारह देशों को छूट दी गई थी क्योंकि ग्लोबल एआई डेटा सेंटर क्षमता में उनकी अच्छी हिस्सेदारी थी और वे या तो फाइव आईज़ देश थे, नाटो के करीबी सहयोगी थे, या पहले से ही एक बड़े सेमीकंडक्टर सेंटर थे। अब रद्द हो चुके इस ढांचे के तहत इंपोर्ट लिमिट पार करने के लिए सरकारों के स्तर पर भरोसे की ज़रूरत होती है, और यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए ज़रूरी राजनयिक, पूंजी और नियामक क्षमता भारत अभी भी विकसित कर रहा है। अगर भावी अमेरिकी प्रशासन इस ढांचे को फिर से ले आए तो क्या होगा? दरअसल, हाल ही में, यूनाइटेड स्टेट्स गवर्नमेंट एकाउंटेबिलिटी ऑफिस (GAO) ने एक फ़ैसला किया जिसमें उसने कहा कि एआई डिफ़्यूज़न नियम को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया जा सकता है क्योंकि रद्द करने की घोषणा भी कांग्रेशनल रिव्यू एक्ट के मकसद के लिए एक नियम है। यानी, औपचारिक रूप से रद्द किए जाने का फ़ैसला लागू करने से इसे अमेरिकी कांग्रेस और अमेरिकी कंपट्रोलर जनरल के सामने पेश करना होगा।
दूसरी घटना, जब एंथ्रोपिक ने अप्रैल 2026 में अपने क्लाउड मिथोस प्रीव्यू मॉडल का ऐलान किया- ऐसा फ्रंटियर एआई मॉडल, जिसकी साइबर सुरक्षा क्षमताएं इतनी ताकतवर थीं कि कंपनी ने दुनिया भर में करीब चालीस संस्थानों तक ही इसे पहुंचने दिया- तब भारत उन संस्थानों में शामिल नहीं था। इनमें में से 39 अमेरिकी थे, जबकि इकलौता गैर-अमेरिकी संस्थान था यूनाइटेड किंगडम का एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट। इसके बाद, अमेरिकी सरकार ने एंथ्रोपिक को अपने फेबल 5 मॉडल का एक्सेस सभी विदेशी नागरिकों के लिए सस्पेंड करने का आदेश दिया, जिसमें उसके कर्मचारी भी शामिल थे। अमेरिकी सरकार के निर्देशों के अनुसार इस मॉडल को वापस लेना, अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ कॉमर्स की आम गाइडेंस के मुताबिक नहीं था, लेकिन इससे अमेरिकी एक्सपोर्ट कंट्रोल नियमों के भरोसेमंद होने पर सवाल उठे, क्योंकि अमेरिका अब तक केवल एडवांस एआई चिप्स पर ही रोक लगा रहा था।
यह उन लोगों के लिए एक चेतावनी है, जो शायद सोचते थे कि भारत का बड़ा बाज़ार होने की वजह से उसे इन फ्रंटियर एआई मॉडल्स तक आसानी से पहुंच मिल जाएगी। भारत ने अभी तक वो जरूरी सिस्टम और तकनीक तैयार नहीं की है: सुरक्षा संस्थान, मूल्यांकन और परीक्षण का ढांचा, और मजबूत सुरक्षा बुनियादी ढांचा, जो उसे इन एडवांस एआई मॉडल्स को जल्दी हासिल करने में मदद कर सकते थे।
यहां तक कि एप्लिकेशन लेयर (यानी ऐप्स बनाने के स्तर) पर भी, भारतीय डेवलपर्स यह मानकर नहीं चल सकते कि एआई मॉडल्स तक उनकी पहुंच हमेशा रहेगी, या वह निष्पक्ष होगी। बड़ी एआई कंपनियां अपने मॉडल्स को दूसरे डाउनस्ट्रीम प्रोडक्ट्स (यानी आगे काम आने वाले उत्पादों) या ऐप्स के साथ जोड़ सकती हैं। वे ऐसा या तो इन्हें अपने खुद के ऐप्स में पैक करके कर सकती हैं, या फिर टेलीकॉम कंपनियों के साथ मिलकर क्लाउड स्टोरेज, सिक्योरिटी टूल्स और जीपीयू एक्सेस जैसी चीज़ों के साथ एआई की पहुंच को पैकेज की शक्ल दे सकती हैं।
आखिरी बात, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तक सबकी पहुंच को आसान बनाने वाला "एआई के लिए डीपीआई (डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर)" का तरीका भी अव्यावहारिक होने के जोखिम में है, अगर इसके लिए ज़रूरी कंप्यूट को खुद बनाने के बजाय बाहर से खरीदा गया हो। एआई के लिए डीपीआई का मुख्य वादा छोटे खिलाड़ियों के लिए भारी लागत को कम करना है। भारत सरकार का एक दस्तावेज़ एआई के लिए डीपीआई के इस वादे को इन शब्दों में व्यक्त करता है: “इसका महत्व उन छोटी कंपनियों, रिसर्च संस्थानों और स्टार्टअप्स के लिए पूर्वानुमानित, पारदर्शी और आपस में जुड़ने लायक पहुंच के रास्ते बनाने में है, जो शुरुआती लागत ज़्यादा होने की वजह से इसमें प्रवेश करने में रुकावट का सामना करते हैं। लागत को कम करके, इंटरफेस का स्टैंडर्डाइजेशन करके और सामान्य गवर्नेंस के नियम बनाकर, डीपीआई उन भागीदारों का दायरा सार्थक रूप से बढ़ा सकता है जो एआई इंफ्रास्ट्रक्चर से फायदा उठा सकते हैं।”
हालांकि, अगर भारत वैश्विक बाज़ार की कीमतों पर जीपीयू का इंपोर्ट करता है, जिस पर भारी टैक्स लग सकता है, एक्सपोर्ट कंट्रोल की पाबंदियां हो सकती हैं, या अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों की वजह से मांग बढ़ सकती हैं, तो कंप्यूट की बुनियादी लागत बेहद ऊंची बनी रहेगी। महंगे इंपोर्टेड हार्डवेयर पर आधारित एक बेहतर एक्सेस लेयर (पहुंच प्रणाली) बनाना बिल्कुल वैसा ही है, जैसे किसी महंगे टोल रोड पर बस सेवा को सब्सिडी देना। इसे चलाना तो लोकतांत्रिक है, लेकिन इसकी आधारभूत अर्थव्यवस्था पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर करती है और ज़रूरी नहीं कि इसका मकसद छोटी कंपनियों को फायदा पहुंचाना या सबको साथ लेकर चलना हो।
ASML के सबक और भारत इससे क्या सीख सकता है
सेमीकंडक्टर लिथोग्राफी के इतिहास की एक ऐसी कहानी है जो यहां दोबारा बताई जाने लायक है, प्रेरणा के लिए नहीं, बल्कि एक सीख के तौर पर।
1990 के दशक में, ASML उस बाज़ार में तीसरे नंबर पर थी जहां निकॉन और कैनन का दबदबा था। इन दोनों कंपनियों के बेहद गहरे रिश्ते इंटेल और आईबीएम जैसी उस दौर की सबसे बड़ी चिप बनाने वाली कंपनियों के साथ थे। ASML उनके मुकाबले काफी छोटी थी, उसके पास पूंजी कम थी, और वह उन लेंसों के लिए ज़ाइस पर निर्भर थी जिन्हें वह खुद नहीं बना सकती थी। उस समय कोई भी समझदार आदमी यही सोचता कि माइक्रोचिप बनाने के लिए 'एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट' (EUV) लाइट का इस्तेमाल करना बहुत महंगा और जोखिम भरा है, और इससे बाज़ार पर कब्जा जमाए बैठे बड़े दिग्गजों को पीछे हटाना नामुमकिन है।
लेकिन ASML का सोचना ऐसा नहीं था। इसके बजाय, उसने ज़ाइस के साथ मिलकर उन लेंसों को डिज़ाइन किया, जिनसे आगे चलकर डीप अल्ट्रावायलेट (DUV) मशीनें बनीं, जो बाद में आने वाली EUV मशीनों का शुरुआती रूप थीं। EUV पर काम करने के लिए, उसने 1998 में EUV यूक्लाइड्स कंसोर्शियम बनाया, दूसरे यूरोपीय साझेदारों और सरकारों को शामिल किया ताकि यह रिसर्च की जा सके कि माइक्रोचिप बनाने के लिए EUV लाइट का इस्तेमाल कैसे हो। जब इस रिसर्च में बड़ी कामयाबी मिली, तब ASML ने इंटेल के साथ काम करने की इच्छा जताई। इंटेल भी एक से ज़्यादा लिथोग्राफी सप्लायर्स को सपोर्ट करना चाहता था, क्योंकि वह किसी एक कंपनी पर पूरी तरह निर्भर रहने के रणनीतिक जोखिम को समझता था। आज ASML दुनिया में EUV मशीनें बनाने वाली इकलौती कंपनी है। यह 5,000 से भी ज़्यादा सप्लायर्स के साथ काम करती है और सिर्फ सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री की सबसे अहम कड़ी बन चुकी है।
सबक यह नहीं है कि भारत को ASML बनने की कोशिश करनी चाहिए। असल सबक उस दांव को समझना है जो ASML ने खेला था: उसने तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल एक ऐसी समस्या को पहचाना जिसे सुलझाना बाज़ार की ज़रूरत थी, उसने इस काम को अकेले करने के बजाय साझेदार बनाए, और खुद को ऐसा बना दिया जिसके बिना काम नहीं चल सकता, उन लोगों के लिए भी, जो उसे खारिज कर सकते थे।
भारत ऐसा क्या बना सकता है जिसकी दुनिया को ज़रूरत होगी?
भारत की परंपरा तकनीक को विकास के लिए इस्तेमाल करने की रही है, न कि उससे फायदा उठाने की। जैसे, आपदा प्रबंधन के लिए स्पेस इमेजरी (सैटेलाइट तस्वीरों) को साझा करना; बड़े पैमाने पर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का एक्सपोर्ट करना; वैक्सीन डिप्लोमेसी व जेनेरिक दवाएं दुनिया के उन कोनों तक पहुंचाना जहां पेटेंट वाली महंगी दवाएं नहीं पहुंच पाती थीं। यह वाकई में तारीफ के काबिल है, लेकिन एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए यह तरीका शायद नाकाफ़ी साबित हो सकता है।
जैसे-जैसे एआई और ज़्यादा जटिल होता जा रहा है, इसे चलाने वाली सप्लाई चेन पर नियंत्रण की होड़ बढ़ती जा रही है, और फ्रंटियर एआई मॉडल्स तक पहुंच अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनती जा रही है, भारत को अब अलग तरह के सवाल पूछने शुरू करने होंगे। ऐसे सवाल नहीं कि हम किसी और के बनाए इंफ्रास्ट्रक्चर पर कौन से ऐप्लिकेशंस बना सकते हैं, बल्कि ऐसे सवाल कि दुनिया को, शायद अब से कुछ साल बाद, ऐसी किस चीज़ की ज़रूरत होगी जिसे बनाने की स्थिति में हम हो सकते हैं, लेकिन जिस बारे में हमने अभी तक सोचा भी नहीं है।
भारत को यह पूछना होगा कि ऐसी क्या चीज़ है जिसकी दुनिया की ज़रूरत है, भारत उसे बना सकता है और जिसके फायदे भविष्य में मिलेंगे। यहां दलील यह नहीं है कि हर चीज़ के लिए कोशिश की जाए। यहां दलील यह है कि भारत को पहले ही यह सोचकर अपने रास्ते बंद नहीं कर लेने चाहिए कि एआई की इस पूरी वैल्यू चेन में उसकी भूमिका सिर्फ ऐप्स बनाने तक सीमित है।
बीते वक्त में कई एआई हार्डवेयर स्टार्टअप्स को जूझना पड़ा था क्योंकि डेवलपर्स पूरी तरह से नए आर्किटेक्चर के लिए अपने सॉफ्टवेयर को दोबारा लिखने में कतराते थे। हालांकि, हाल ही में कुछ कंपनियों ने ऐसे एआई चिप्स बनाए हैं जो CUDA (कंप्यूट यूनिफाइड डिवाइस आर्किटेक्चर) पर आधारित माहौल के साथ काम कर सकते हैं। ऐसा करके उन्होंने कंपनियों और एआई डेवलपर्स के लिए पुरानी तकनीक छोड़कर नई तकनीक अपनाने की लागत को काफी कम कर दिया है, जिससे डेवलपर्स की तरफ से इन चिप्स को अपनाए जाने की संभावना भी बढ़ सकती है। बेशक, यह अभी शुरुआत है। रास्ता लंबा है। लेकिन यह एक ऐसा दांव है जो बाज़ार को गंभीरता से लेता है, एक वास्तविक कमी को पहचानता है, और कोशिश करने के लिए किसी की मंजूरी का इंतज़ार नहीं करता। इसका एक अच्छा उदाहरण एडवांस्ड पैकेजिंग है।
एडवांस्ड पैकेजिंग
भारत सरकार के थिंक टैंक, नीति आयोग ने हाल ही में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत की महत्वाकांक्षाओं के लिए एक रोडमैप जारी किया है और संभावित फोकस क्षेत्रों की रूपरेखा तैयार की है। एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में एडवांस्ड पैकेजिंग की पहचान की गई है। नीति आयोग की इस रिपोर्ट का मानना था कि "भारत को घरेलू मांग के लिए आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए, साथ ही वैश्विक स्तर पर टॉप तीन स्थानों में शामिल होने के लिए पूरी कोशिश करनी चाहिए।"
यह एक सकारात्मक कदम है। पहले पैकेजिंग को सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन का एक शुरुआती हिस्सा माना जाता था। लेकिन जब से जेनरेटिव एआई ने सिंगल-चिप आर्किटेक्चर की सीमाओं को उजागर किया है, तब से यह एआई के विकास के लिए बेहद ज़रूरी हो गया है। लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के तेज़ी से बढ़ने के कारण मेमोरी बैंडविड्थ (जो प्रोसेसर तक डेटा पहुंचाने में मदद करती है) की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। इसकी वजह से 'हाई मेमोरी बैंडविड्थ' (HBM) की ज़रूरत पैदा हुई है, जिसे पुराने ढंग से पैकेजिंग के ज़रिए बनाना काफी मुश्किल है। एडवांस्ड पैकेजिंग में मेमोरी को कंप्यूटर प्रोसेसर के जितना हो सके, उतना पास रखने पर ध्यान दिया जाता है। इसमें परफॉर्मेंस सुधारने और इंटीग्रेटेड सर्किट की डेंसिटी को बढ़ाने के लिए कई छोटे-छोटे चिप्स को एक- दूसरे के ऊपर रखकर जमाया जाता है।
चिप्स को एक के ऊपर एक सटाकर रखने का मतलब है कि उनके बीच की दूरी कम हो जाती है। इससे लेटेंसी (डेटा पहुंचने में लगने वाला वक्त) कम होती है और परफॉर्मेंस में काफी सुधार आता है, और यह सब अगली पीढ़ी के महंगे प्रोसेस नोड पर अपग्रेड किए बिना ही मुमकिन हो जाता है। दरअसल, अमेरिका के ज़्यादातर एक्सपोर्ट कंट्रोल्स सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन के उन आधुनिक हिस्सों पर लागू होते हैं जो आगे की प्रक्रियाओं से जुड़े हैं, जैसे कि सेमीकंडक्टर बनाने वाले उपकरण (SME), इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स और एडवांस एआई चिप्स। यह स्थिति भारत जैसे देशों के लिए वैल्यू चेन के इस हिस्से (एडवांस्ड पैकेजिंग) में ज़्यादा काम करना आसान बनाती है, क्योंकि यहां उन्हें किसी भी पाबंदी का सामना नहीं करना पड़ता।
यहां भारत इंटरपोज़र्स पर फोकस कर सकता है- ये ऐसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होते हैं जो चिप्स को एक-दूसरे से और उस मुख्य बेस से जोड़ते हैं जिस पर चिप रखी जाती है। इन्हें बनाने के लिए फाउंड्री-ग्रेड 65 एनएम प्रोसेस नोड्स की ज़रूरत होती है, जिसके लिए भारत आसानी से मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है। हालांकि, अलग-अलग सामग्रियों की कई परतों को एक-दूसरे के ऊपर रखने की वजह से इसमें बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा हो सकती है, जिसके लिए थर्मल मैनेजमेंट की ज़रूरत होती है। जहां हवा से ठंडा करने का पारंपरिक तरीका काम नहीं करता, वहां लिक्विड कूलिंग जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
"अज्ञात अज्ञात" सवाल जो हमने अब तक नहीं पूछे हैं
अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने एक बार कहा था कि दुनिया में तीन तरह की चीज़ें होती हैं: "ज्ञात ज्ञात" (known knowns), "ज्ञात अज्ञात" (known unknowns), और "अज्ञात अज्ञात" (unknown unknowns)। भारत की AI रणनीति काफी हद तक पहले वर्ग यानी "ज्ञात ज्ञात" के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। यहां "ज्ञात ज्ञात" से मतलब उन चीज़ों से है जिनकी ज़रूरत के बारे में भारत अच्छी तरह जानता है, जैसे कि जीपीयू और गवर्नेंस फ्रेमवर्क। अब भारत ने दूसरे वर्ग यानी "ज्ञात अज्ञात" पर भी काम करना शुरू कर दिया है, वे चीज़ें जिनके बारे में भारत जानता है कि वे अभी उसके पास नहीं हैं, जैसे सॉवरेन मॉडल्स या फ्रंटियर एआई का सुरक्षित मूल्यांकन करने का बुनियादी ढांचा।
लेकिन तीसरा वर्ग, यानी वे चीज़ें जिनके बारे में भारत ने अभी तक सोचने की शुरुआत भी नहीं की है, यही वह जगह है जहां अक्सर रणनीतिक बढ़त बनाई जाती है। ASML ने लिथोग्राफी बाज़ार पर एकाधिकार जमाने के इरादे से शुरुआत नहीं की थी। उसने तो बस एक ऐसी समस्या को सुलझाने का बीड़ा उठाया था जिसे बाकी सब ने छोड़ दिया था। अब भारत के सामने जो सवाल है वह भले ही असहज करने वाला हो, लेकिन बेहद ज़रूरी है: क्या एआई टेक स्टैक में कोई ऐसा हिस्सा है- कोई पुर्जा, सामग्री, प्रक्रिया या इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई ऐसी परत- जिसकी ज़रूरत आज की एआई ताक़तों को इतनी बड़ी तादाद में पड़ेगी जो अभी उनके पास नहीं है, इतने बड़े पैमाने पर जिसकी वे अभी कल्पना भी नहीं कर सकते? क्या भारत उस चीज़ को बनाने की स्थिति में आ सकता है?
यह कोई नासमझी नहीं है। यह उस देश का बिल्कुल सही रुख है जिसने बार-बार साबित किया है कि जब वह ठान लेता है, तो मुश्किल तकनीकी समस्याओं के भी बेहतरीन समाधान दे सकता है: अंतरिक्ष, दवाओं, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और अब, शुरुआती तौर पर ही सही, सेमीकंडक्टर में। पैकेजिंग, फैब्रिकेशन और टूलिंग में आईएसएम की तरक्की इस बात का सबूत है कि भारत में औद्योगिक नीति का मुश्किल काम मुमकिन है, बशर्ते इसे सब्र और सटीक योजना के साथ किया जाए। भले ही इंडिया एआई मिशन (IAM) भारत में कंप्यूट लेकर आया है, लेकिन खरीदा हुआ कंप्यूट और खुद बनाई गई क्षमता दोनों एक जैसे नहीं होते। सेमीकंडक्टर मिशन की, ASML की और हर उस कंपनी से मिली सीख, जिसने खुद को टेक्नोलॉजी की सप्लाई चेन में सबसे महत्वपूर्ण बनाया है, किसी भी सरकारी पॉलिसी पेपर की तुलना में ज़्यादा आसान है और ज़्यादा चुनौती भरी भी।
कुछ नया बनाओ। दुनिया अपने आप आएगी।
इस लेख का अनुवाद धीरज कुमार (फ्रीलांस, कार्नेगी इंडिया) ने किया है।
लेखक के बारे में
फेलो
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हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में दुनिया के सबसे घने समुद्री केबल नेटवर्कों में से एक मौजूद है। फिर भी, दुनिया भर के इंटरनेट ट्रैफिक में एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद इस नेटवर्क के मालिकाना हक, उनके रास्तों और उनकी देखरेख में भारत की भागीदारी बहुत कम है।
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