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Source: Getty

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Carnegie India

भारत के रूसी तेल इंपोर्ट पर अमेरिकी प्रतिबंध और टैरिफ का असर

इस लेख में अमेरिकी प्रतिबंध और टैरिफ पर भारत की प्रतिक्रिया की जांच की गई है, खासकर इंपोर्ट लागत में बदलाव जैसे बाज़ार पर तुरंत पड़ने वाले नतीजों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति के दृष्टिकोण पर बड़े रणनीतिक प्रभावों का आकलन इस लेख में किया गया है।

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द्वारा वृंदा सहाय
पर प्रकाशित 16 दिस॰ 2025
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परियोजना

सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम

सिक्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा में भारत की तेज़ी से विकसित होती भूमिका पर जटिल समीकरण असर डालते हैं। सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम के विशेषज्ञ इस विश्व व्यवस्था में भारत की हैसियत की समीक्षा इसकी विदेश और सुरक्षा नीतियों के विश्लेषणों के माध्यम से करते हैं, जिसमें खास तौर पर ध्यान चीन के साथ संबंध, सीमाओं की सुरक्षा और हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति पर दिया जाता है।

और अधिक जानें

करीब तीन साल तक लगातार बढ़ोतरी के बाद, नवंबर 2025 में रूसी कच्चे तेल का भारत का इंपोर्ट काफी कम हो गया। ये हुआ रूसी एनर्जी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध और भारत पर बड़े पैमाने पर जवाबी टैरिफ लगाए जाने के बाद। इस टैरिफ में रूसी तेल खरीद पर ड्यूटी भी शामिल थी। इन आर्थिक दबावों के जवाब में, भारतीय तेल कंपनियां रूसी कंपनियों के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों का फिर से आकलन कर रही हैं।

इस लेख में अमेरिकी प्रतिबंध और टैरिफ पर भारत की प्रतिक्रिया की जांच की गई है, खासकर इंपोर्ट लागत में बदलाव जैसे बाज़ार पर तुरंत पड़ने वाले नतीजों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति के दृष्टिकोण पर बड़े रणनीतिक प्रभावों का आकलन इस लेख में किया गया है।

भारत की निर्भरता का स्तर

अमेरिका और चीन के बाद भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कंज़्यूमर है। 2025 में, इसकी खपत बढ़कर 265.7 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) हो गई, जिसमें सालाना 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। सीमित घरेलू उत्पादन क्षमता के कारण भारत को अपनी ज़रूरतों का लगभग 89 प्रतिशत इंपोर्ट करना पड़ता है।[1]

2022 में रूस-यूक्रेन विवाद शुरू होने से पहले, भारत के इंपोर्ट में रूसी तेल का हिस्सा लगभग 2.5 फीसदी था। यूरोपियन यूनियन, G7 और अमेरिका के रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने और उसके तेल एक्सपोर्ट को घटाने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों के जवाब में, मॉस्को ने एशियाई खरीदारों को डिस्काउंट दिया, जिससे उसके तेल की कीमत ब्रेंट बेंचमार्क से कम हो गई।1 इससे इंपोर्ट में बड़ा बदलाव आया और भारतीय रिफाइनरियों को लगभग $12.2 प्रति बैरल का फायदा हुआ। नतीजतन, वित्त वर्ष 2022-23 में रूस से भारत का तेल इंपोर्ट बढ़कर 21.6 फीसदी हो गया, जिससे भारत रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा इंपोर्टर बन गया। रूस से भारत का तेल इंपोर्ट वित्त वर्ष 2023-24 में 35.9 फीसदी और वित्त वर्ष 2024-25 में 35.8 फीसदी रहा।

अमेरिका के प्रतिबंध और टैरिफ

इंपोर्ट के इस पैटर्न ने रूस के साथ भारत के ऊर्जा व्यापार को निशाना बनाने वाली अमेरिकी कार्रवाइयों के लिए माहौल तैयार किया। 27 अगस्त, 2025 को अमेरिका ने 25 फीसदी जवाबी टैरिफ के अलावा भारत की रूसी तेल खरीद पर 25 फीसदी ड्यूटी लगा दी। रूसी कंपनियों रोसनेफ्ट, लुकोइल और उनकी सब्सिडियरी कंपनियों पर प्रतिबंधों की घोषणा 22 अक्टूबर को हुई, जिनके लागू होने की तारीख 21 नवंबर, 2025 तय की गई। इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार रूस से भारत के तेल इंपोर्ट को रोकने की बात कही, ताकि "रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाया जा सके और अपनी वॉर मशीन के लिए रेवेन्यू जुटाने की क्रेमलिन की क्षमता को कम किया जा सके।"

रोसनेफ्ट और लुकोइल से खरीद भारत के इंपोर्ट का 60 फीसदी था, जिससे उसे दूसरे स्रोत तलाशने को मजबूर होना पड़ा। इस बीच, अक्टूबर 2025 में अमेरिका से भारत को होने वाला तेल इंपोर्ट 2024 में लगभग 3 फीसदी से बढ़कर 10.7 फीसदी हो गया। यह कुछ हद तक फरवरी 2025 में घोषित “मिशन 500” के तहत भारत-अमेरिका के बीच आपसी व्यापार को 2030 तक $500 बिलियन तक बढ़ाने की कोशिशों को दिखाता है। इसके अलावा यह अगस्त 2025 की ड्यूटी और टैरिफ के बाद दिए गए ऑर्डर को भी दिखाता है, क्योंकि आम तौर पर शिपिंग पीरियड 45-55 दिन का होता है। अक्टूबर के प्रतिबंधों का अगर कोई असर होता है, तो आने वाले महीनों में यह साफ़ हो जाएगा।

टेबल 1. रूसी कच्चे तेल का भारत में इंपोर्ट
तारीख (2025) मात्रा (मिलियन बैरल/दिन)
3 अगस्त 1.56
10 अगस्त* 1.47
17 अगस्त 1.44
24 अगस्त 1.36
31 अगस्त** 1.35
7 सितंबर 1.32
14 सितंबर 1.17
21 सितंबर 1.13
28 सितंबर 1.69
5 अक्टूबर 1.57
12 अक्टूबर 1.68
19 अक्टूबर 1.50
26 अक्टूबर*** 1.16
2 नवंंबर 0.94

स्रोत: प्रेजुला प्रेम, “Russia’s Crude Flows Jump to Three-Month High on Black Sea Surge,” ब्लूमबर्ग, 10 सितंबर 2025 https://www.bloomberg.com/news/articles/2025-09-10/russia-s-crude-flows-jump-to-three-month-high-on-black-sea-surge#selection-1149.0-1149.64; जुलियन ली, “Russian Oil Flows Show Buyers Shunning Trump’s Push to End Trade,” ब्लूमबर्ग, 30 सितंबर, 2025, https://www.bloomberg.com/news/articles/2025-09-30/russia-s-oil-exports-shrug-off-trump-s-pressure-on-overseas-buyers, जुलियन ली, “Russia’s Crude Deliveries Plunge as US Sanctions Begin to Bite,” ब्लूमबर्ग, 4 नवंबर, 2025, https://www.bloomberg.com/news/articles/2025-11-04/russia-s-crude-deliveries-plunge-as-us-sanctions-begin-to-bite; जहां एक ही तारीख के लिए स्रोतों के बीच अंतर है, वहां सबसे बाद में प्रकाशित आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।

*25 फीसदी जवाबी टैरिफ 7 अगस्त, 2025 से लागू

**25 फीसदी एडिशनल ड्यूटी 27 अगस्त, 2025 से लागू

***रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध की घोषणा 22 अक्टूबर, 2025 को हुई

बाज़ार की प्रतिक्रिया और नए सप्लायर्स की तलाश 

अमेरिका के प्रतिबंध की वजह से दुनिया भर में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। कीमतों में बढ़ोतरी से भारत के सालाना तेल इंपोर्ट खर्च में $6–7 बिलियन की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। इसके अलावा, संभावना है कि भारतीय रिफाइनरियां डिस्काउंट वाले रूसी तेल पर निर्भरता कम करेंगी, जिससे कामकाज की लागत में करीब 2 फीसदी की बढ़ोतरी होगी।

रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी इंपोर्टर, रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अक्टूबर 2025 में प्रतिबंधित कंपनियों से ऑर्डर 13 फीसदी कम कर दिए, जबकि सऊदी अरब से महीने का इंपोर्ट 87 फीसदी और इराक से 31 फीसदी तक बढ़ा दिया, जिससे इंपोर्ट में उनका कुल हिस्सा सितंबर 2025 में 26 फीसदी से बढ़कर अक्टूबर 2025 में 40 फीसदी हो गया। सरकारी कंट्रोल वाली रिफाइनरियों, मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड, और HPCL-मित्तल एनर्जी लिमिटेड ने भी अपने इंपोर्ट बंद करने की योजना का एलान किया। इन कंपनियों ने मिलकर, 2025 की पहली छमाही में रूस से भारत की कुल तेल खरीद का आधे से ज़्यादा हिस्सा खरीदा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय रिफाइनरियों ने प्रतिबंध से बचने के लिए 21 नवंबर की डेडलाइन से पहले रूसी कच्चे तेल की खरीद तेज़ कर दी। उम्मीद है कि गुजरात के वडिनार में भारत की दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी चलाने वाली नायरा एनर्जी प्रतिबंधित कंपनियों से इंपोर्ट जारी रख सकती है क्योंकि इसकी 49.13 फीसदी हिस्सेदारी रोसनेफ्ट के पास है। इंडियन ऑयल कॉर्प जैसी दूसरी भारतीय रिफाइनरियों का मकसद डायवर्सिफाई करना या गैर-प्रतिबंधित बिचौलिया कंपनियों के ज़रिए खरीद जारी रखना है।

रणनीतिक निहितार्थ

रूसी तेल कंपनियों पर अमेरिका के प्रतिबंध से भारत के व्यापार और कूटनीतिक रवैये के लिए तीन निहितार्थ हैं:

पश्चिमी देशों की छानबीन 

यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन ने अमेरिकी प्रतिबंधों का समर्थन किया है, जो 2025 में रूस नीति पर बेहतर ट्रांसअटलांटिक तालमेल का संकेत है। इससे रूस के साथ भारत के तेल व्यापार पर पश्चिमी देशों की छानबीन बढ़ सकती है। 2018-2024 के बीच, यूरोपियन यूनियन को भारत से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट काफी बढ़ गया। अक्टूबर 2025 की EU कम्प्लायंस गाइडलाइंस में घोषित किए गए “रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड प्रोडक्ट्स पर इंपोर्ट बैन” के तहत यूरोपियन यूनियन को एक्सपोर्ट में शायद कमी आ सकती है। ये गाइडलाइंस जनवरी 2026 से लागू होंगी।

 संतुलन बनाने के लिए भारत के कदम

अक्टूबर 2025 में, अमेरिका से भारत का कच्चा तेल इंपोर्ट मार्च 2021 के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। यह उछाल मुख्य रूप से तीन वजहों से हुआ: “मिशन 500” के तहत $500 बिलियन का द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य, ऊंचे जवाबी टैरिफ पर कूटनीतिक प्रतिक्रिया की ज़रूरत, और भारतीय रिफाइनरियों पर सेकेंडरी बैन के ख़तरे को टालने की कोशिशें।

लेकिन, इन बढ़ते इंपोर्ट से ये संकेत नहीं मिलता कि रूसी तेल पर भारत की निर्भरता कम होगी। हालांकि आने वाले महीनों में रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध से इंपोर्ट पैटर्न पर असर पड़ सकता है, लेकिन इन कंपनियों का हिस्सा रूस के कुल प्रोडक्शन में सिर्फ़ 49.2 फीसदी है। बाकी 50.8 फीसदी गैर-प्रतिबंधित रूसी कच्चा तेल अभी भी खरीदा जा सकता है। इसके अलावा, रूस से आने वाले “मीडियम-सार क्रूड” से भारत को रिफाइंड लाइट-नैफ्था, डीज़ल और फ्यूल ऑयल के बैलेंस्ड प्रोडक्शन में मदद मिलती है, और ये उसके रिफाइनरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। इसलिए नई दिल्ली को रूस के साथ अपने आर्थिक लक्ष्यों और अमेरिका के साथ आगे की द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के बीच संतुलन जारी रखना होगा।

इंपोर्ट के लिए दूसरे स्रोतों की तलाश

अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाते हुए, भारत का मकसद सावधानी के साथ रणनीतिक कदमों के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा हासिल करना है। भारत सरकार ने डाइवर्सिफिकेशन की और भी गुंजाइश जताई है। जैसा कि पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है, "अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की काफी सप्लाई और दूसरे सोर्स हैं, भले ही एक सप्लाई स्ट्रीम में रुकावट आए।" भारतीय कंपनियों ने इराक और संयुक्त अरब अमीरात से अपने तेल इंपोर्ट को डाइवर्सिफाई करना शुरू कर दिया है और वे धीरे-धीरे ब्राज़ील, अर्जेंटीना, कोलंबिया और गयाना जैसे लैटिन अमेरिकी देशों और नाइजीरिया, घाना, टोगो और सेनेगल जैसे पश्चिमी अफ्रीकी देशों से खरीदारी बढ़ा सकती हैं।

आगे का रास्ता

नई दिल्ली का रुख सबसे ज़्यादा प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को देने का है, जहां रूसी तेल से पूरी तरह पीछे हटना व्यावहारिक नहीं होगा। हालांकि, वॉशिंगटन के लिए, रूसी तेल के भारतीय इंपोर्ट में कमी आगे की द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के लिए एक महत्वपूर्ण जांच-बिंदु है।

छोटी अवधि में, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के प्रतिबंध इन इंपोर्ट में कमी ला सकते हैं, और धीरे-धीरे डायवर्सिफिकेशन से भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकता है। भू-राजनीतिक बदलावों के असर पर ध्यान रखने के अलावा, भारत को एक संतुलित एनर्जी पोर्टफोलियो का भी लक्ष्य रखना चाहिए।

[1] ब्रेंट बेंचमार्क एक ग्लोबल प्राइसिंग स्टैंडर्ड है जिसका इस्तेमाल दुनिया में व्यापार होने वाले तेल के तीन-चौथाई से ज़्यादा हिस्से की कीमत तय करने के लिए किया जाता है। “ब्रेंटTM दुनिया का क्रूड बेंचमार्क,” इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज, सितंबर 2020, https://www.ice.com/insights/market-pulse/brent-the-worlds-crude-benchmark#.

लेखक के बारे में

वृंदा सहाय

रिसर्च एनालिस्ट, सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम

वृंदा सहाय कार्नेगी इंडिया में सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम की एक रिसर्च एनालिस्ट हैं।

वृंदा सहाय
रिसर्च एनालिस्ट, सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम
वृंदा सहाय
विदेश नीतिTradeइकॉनमीसुरक्षाभारतअमेरिका

कार्नेगी सार्वजनिक नीति मुद्दों पर संस्थागत पद नहीं लेता; यहाँ व्यक्त विचार लेखक(ओं) के हैं और जरूरी नहीं कि वे कार्नेगी, उसके कर्मचारियों या ट्रस्टियों के विचारों को दर्शाते हों।

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      • +3

      अजय कुमार, अमलान मोहंती, शतक्रतु साहू, …

  • टिप्पणी
    अमेरिकी AI नीति के लिए आगे क्या?

    इस लेख में डीरेगुलेशन के मुद्दों पर ट्रम्प प्रशासन और दूसरी प्रेरक ताक़तों के संभावित कदम, AI में अमेरिका की लीडरशिप, राष्ट्रीय सुरक्षा और AI सुरक्षा पर वैश्विक सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया है।

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  • टिप्पणी
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