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दुनिया भर में बिछ रहे समुद्री केबल नेटवर्क की दौड़ में भारत की भूमिका

स्रोत: Getty

लेख
Carnegie India

दुनिया भर में बिछ रहे समुद्री केबल नेटवर्क की दौड़ में भारत की भूमिका

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में दुनिया के सबसे घने समुद्री केबल नेटवर्कों में से एक मौजूद है। फिर भी, दुनिया भर के इंटरनेट ट्रैफिक में एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद इस नेटवर्क के मालिकाना हक, उनके रास्तों और उनकी देखरेख में भारत की भागीदारी बहुत कम है।

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द्वारा चारुकेशी भट्ट
पर प्रकाशित 30 सित॰ 2026
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परियोजना

टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी

यह कार्यक्रम पांच प्रमुख क्षेत्रों से संबंधित है: डेटा गवर्नेंस और प्राइवेसी; सेमीकंडक्टर और रक्षा समेत रणनीतिक प्रौद्योगिकी; एआई और जैव सुरक्षा जैसी उभरती हुई प्रौद्योगिकी; तेज़ विकास और राज्यों के बीच आपसी संवाद पर फोकस के साथ डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर; और महत्वपूर्ण और उभरती हुई प्रौद्योगिकी पर भारत-अमेरिका पहल और यूरोपीय संघ-भारत व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद जैसी रणनीतिक साझेदारी।

और अधिक जानें

इस रिसर्च-पेपर में पेश विश्लेषण 31 मई, 2026 तक के घटनाक्रम पर आधारित हैं।

समुद्र के नीचे बिछी केबल आधुनिक इंटरनेट का एक ऐसा आधार हैं जो काफी हद तक ना दिखाई देने के बावजूद अनिवार्य है, और जो दुनिया भर के डेटा ट्रैफ़िक के करीब 99 फीसदी हिस्से को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है। बड़े वित्तीय लेन-देन से लेकर रोज़ की वीडियो कॉल और इंटरनेट चलाने तक, सरकारें, कंपनियां और आम लोग अपने रोज़मर्रा के कामों के लिए इसी बड़े नेटवर्क पर निर्भर हैं। सैटेलाइट के मुकाबले समुद्र के नीचे की ये केबल बहुत तेज़ी से और बिना रुकावट के डेटा पहुंचाती हैं, जो इन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं के डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए ज़रूरी बना देता है। इतनी अहम भूमिका को देखते हुए, अब इन केबलों के लिए जानबूझकर की जाने वाली तोड़फोड़ की घटनाओं से खतरा बढ़ा है, साथ में प्राकृतिक आपदाओं और समुद्री हादसों का जोखिम तो है ही।

भारत के लिए इसके मायने बिल्कुल साफ हैं। डिजिटल सेवाओं के तेज़ विस्तार की वजह से हाई-स्पीड डेटा कनेक्टिविटी की मांग बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, जिसके लिए मजबूत और सुरक्षित केबल नेटवर्क का होना सबसे बुनियादी ज़रूरत है। हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में दुनिया के सबसे घने समुद्री केबल नेटवर्कों में से एक मौजूद है। फिर भी, दुनिया भर के इंटरनेट ट्रैफिक में एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद इस नेटवर्क के मालिकाना हक, उनके रास्तों और उनकी देखरेख में भारत की भागीदारी बहुत कम है। इंटरनेट का इस्तेमाल करने और इसके मैनेजमेंट में शामिल होने के बीच का यह अंतर, आने वाले वक्त में भारत की डिजिटल महत्वाकांक्षाओं पर असर डाल सकता है।

यह लेख इस बात पर ज़ोर देता है कि भारतीय कंपनियों को समुद्र के नीचे बिछने वाली केबल के उद्योग में अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए। शुरुआत में भारत के लिए इन केबल के रणनीतिक महत्व को समझाया गया है, जिसके बाद देश की मौजूदा क्षमताओं और दूसरों पर इसकी निर्भरता का आकलन किया गया है। इसके बाद, लेख में सब-सी केबल पर सहयोग के लिए एक मंच के तौर पर 'क्वॉड' (Quad) का मूल्यांकन किया गया है। 2023 में इस ग्रुप की तरफ से शुरू की गई 'पार्टनरशिप ऑन केबल कनेक्टिविटी एंड रेज़िलिएंस' सब-सी केबल्स में दूसरे देशों के साथ भारत के सबसे बड़े समझौतों में से एक है। इस ग्रुप में वे देश एक साथ आए हैं जो ग्लोबल सब-सी केबल्स इंडस्ट्री के अलग-अलग पहलुओं में सबसे आगे हैं- जापान और अमेरिका में ऐसी बड़ी कंपनियां हैं जो दुनिया की ज़्यादातर केबल बनाती और बिछाती हैं, जबकि सब-सी केबलों की सुरक्षा के लिए ऑस्ट्रेलिया का रेगुलेटरी फ्रेमवर्क एक मॉडल माना जाता है। सब-सी केबल सहयोग के मामले में क्वॉड का प्रदर्शन कैसा रहता है, यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए सब-सी केबल्स का रणनीतिक महत्व

आज, ग्लोबल केबल नेटवर्क में लगभग 600 केबल हैं जो करीब 15 लाख किलोमीटर तक फैले हैं। जैसे-जैसे हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की मांग बढ़ेगी, ज़्यादा क्षमता वाले नए और ज़्यादा मॉडर्न केबल सिस्टम की मांग भी बढ़ेगी। यह मांग हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से ज़्यादा कहीं और नहीं है, जहां दुनिया के पचास परसेंट से ज़्यादा इंटरनेट यूज़र और तेज़ी से डिजिटाइज़ हो रही कई अर्थव्यवस्थाएं हैं। इस इलाके में मज़बूत, हाई-कैपेसिटी वाले डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत बढ़ रही है। एआई यूज़-केस और कंप्यूट के हब के तौर पर तेज़ी से उभर रहे भारत जैसे देश अपने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश को आकर्षित कर रहे हैं और ग्लोबल एआई इकॉनमी में खुद को एक गंभीर खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने में लगे हैं। हालांकि, इन सबके पीछे और मज़बूत कनेक्टिविटी की ज़रूरत है जो अचानक आने वाली रुकावटों से सुरक्षित हो।

हिंद महासागर क्षेत्र अचानक आने वाली रुकावटों के लिए खास तौर पर संवेदनशील है। इस इलाके में समुद्र के नीचे केबल का एक घना नेटवर्क है, जिनमें से कुछ नेटवर्क कई रणनीतिक रुकावट वाले बिंदुओं पर मिलते हैं- जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर का गलियारा और मलक्का जलडमरूमध्य शामिल हैं- और ये एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले केबलों के लिए मुख्य रास्ते का काम करते हैं। इस जमाव से नाकामी की संभावित कमज़ोर कड़ी बनती है: ज़्यादा केबल वाले ऐसे इलाकों में किसी भी रुकावट का असर सभी केबल लाइनों पर पड़ने की संभावना होती है। साल 2024 में एशिया-अफ्रीका-यूरोप-1 लाइन में रुकावट, जिससे इथियोपिया में लगभग पूरा इंटरनेट ब्लैकआउट हो गया और सोमालिया में 80 परसेंट से ज़्यादा कनेक्टिविटी चली गई, ऐसी कमज़ोरियों के नतीजों को दिखाती है।

लेकिन, केबल रूट को तय करने वाले आर्थिक तर्क धीरे-धीरे बदल रहे हैं। पहले, केबल को ऐसे जलडमरूमध्य से भेजा जाता था जो किन्हीं दो जगहों के बीच सबसे छोटे और सबसे सीधे रास्ते होते थे, जिससे महाद्वीपों के तटों के साथ-साथ लंबे रास्ते बनाने के खर्च कम हो जाते थे। उदाहरण के लिए, यूरोप को अफ्रीका और एशिया से जोड़ने वाले सत्रह इंटरनेशनल केबल बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट से गुज़रते हैं। लेकिन, इन अहम स्ट्रेट के आसपास बढ़ती अस्थिरता उन्हें भू-राजनीतिक चोक पॉइंट में बदल सकती है और सबसे सस्ते रास्ते के तौर पर उनकी अहमियत कम कर सकती है। नाकाबंदी या रुकावटों की वजह से केबल को नुकसान का खतरा और उनकी मरम्मत में और भी ज़्यादा वक्त लगने की वजह से, वैकल्पिक लंबे रास्ते को प्राथमिकता दी जा सकती है।

ग्लोबल सब-सी केबल इंफ्रास्ट्रक्चर में हाइपरस्केलर्स (बड़ी टेक कंपनियां) के आने से उन रास्तों के आर्थिक समीकरण भी बदल गए हैं जिन्हें कभी घाटे का सौदा माना जाता था। ये कंपनियां जितनी बड़ी पूंजी लेकर आती हैं, उसे देखते हुए संवेदनशील समुद्री गलियारों के बजाय लंबे रास्तों से केबल ले जाना अब बजट से बाहर नहीं रह गया है; जैसा कि 'प्रोजेक्ट वाटरवर्थ' जैसी परियोजनाएं दिखाती हैं। प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर में 50,000 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक फैला 'प्रोजेक्ट वाटरवर्थ', केबलों में निवेश और उन्हें बिछाने के काम में आए बदलाव को दर्शाता है। भारत जैसे देशों के लिए चिंता की बात यह है कि अगर इन केबलों के रास्ते बदले जा रहे हैं और इन फैसलों को तय करने वाले मुख्य रूप से विदेशी हाइपरस्केलर्स हैं, तो नेटवर्क विस्तार के इस दौर में भारत की घरेलू भागीदारी के बिना ही देश के कनेक्टिविटी इन्फ्रास्ट्रक्चर का नक्शा दोबारा तैयार हो सकता है।

इस मोड़ पर, यह बेहद ज़रूरी है कि ग्लोबल सब-सी केबल इकोसिस्टम में भारत की मौजूदा क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाए और उन कमियों को पहचाना जाए जो इसकी भूमिका को सीमित करती हैं।

भारत की मौजूदा क्षमताएं

ग्लोबल सब-सी केबल इंडस्ट्री कई भागीदारों से मिलकर बनी है। सबसे पहले आते हैं केबल मैन्युफैक्चरर्स, जो समुद्र तल पर केबल सिस्टम डिज़ाइन करते हैं, उसे बनाते हैं और फिर उसे बिछाते हैं। केबलों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने वाले डेटा में इन कंपनियों की कोई सीधी हिस्सेदारी नहीं होती है, लेकिन कुछेक खास जगहों तक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के बड़े पैमाने पर सिमटे होने की वजह से, दुनिया भर में केबल सिस्टम के विस्तार में इनकी भूमिका तेज़ी से बढ़ती जा रही है। सरकारें इन कंपनियों के कामकाज में सीधी दिलचस्पी ले रही हैं, जिससे अनुबंध से जुड़े फैसले भू-राजनीतिक होते जा रहे हैं। केबल मैन्युफैक्चरिंग के बाज़ार पर तीन प्रमुख खिलाड़ियों का दबदबा है- फ्रांस की अल्काटेल सबमरीन नेटवर्क्स, संयुक्त राज्य अमेरिका की सबकॉम, और जापान की एनईसी।

इस इंडस्ट्री में भागीदारों की दूसरी कैटेगरी टेलीकॉम कंपनियों, या केबल कैरियर की है, जो केबल सिस्टम की मालिक होती हैं और या तो खुद इस क्षमता का इस्तेमाल करती हैं या उन्हें किराए पर देती हैं। वे कंसोर्शियम व्यवस्था के जरिए काम करती हैं, जिसमें इच्छुक पक्षों का एक समूह मिलकर केबल सिस्टम में निवेश करता है और उसे आपस में साझा करता है। हाइपरस्केलर, और बड़े पैमाने पर बिग टेक कंपनियां एक और बड़ा ग्रुप हैं। केबल सिस्टम क्षमता लीज पर लेने के अलावा, इन कंपनियों ने केबल के मालिकाना हक तक अपना दायरा बढ़ाया है और अब वे अपने खुद के सिस्टम बना रही हैं, जिससे वे पूरे डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक में भागीदार बनती जा रही हैं।

केबल की मरम्मत करने वाली कंपनियां और जहाज़ इस इंडस्ट्री का कम दिखने वाला लेकिन उतना ही ज़रूरी हिस्सा हैं। खराब केबल का पता लगाने और उनकी मरम्मत करने के लिए खास फर्मों को कॉन्ट्रैक्ट दिया जाता है, जिनमें सबकॉम, ऑरेंज मरीन, ग्लोबल मरीन और ASN मुख्य कंपनियां हैं। मरम्मत की ज़िम्मेदारियां केबल कंसोर्शियम के दस्तखत किए गए समझौतों के ज़रिए दी जाती हैं।

ग्लोबल सब-सी केबल नेटवर्क में भारत की मौजूदा हिस्सेदारी, एक डेटा इकॉनमी के तौर पर इसके आकार और इसकी भौगोलिक स्थिति के रणनीतिक महत्व, दोनों की तुलना में काफी कम है। 2024 में, भारत के पांच शहरों- मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, तूतीकोरिन और तिरुवनंतपुरम- में फैले करीब चौदह केबल लैंडिंग स्टेशनों पर सत्रह इंटरनेशनल सब-सी केबल थे। 2025 तक, यह तादाद बढ़कर तेईस अलग-अलग लैंडिंग्स पर अठारह इंटरनेशनल सब-सी केबल हो गई। इसकी तुलना सिंगापुर से करें, जो भौगोलिक रूप से मुंबई से भी छोटा है, उसके पास अभी आठ लैंडिंग स्टेशनों पर अट्ठाईस केबल हैं, और आने वाले वक्त में इसका और ज़्यादा विस्तार हो सकता है। भारत के लिए, अकेले मुंबई का समुद्र तट भारत के पंचानबे प्रतिशत इंटरनेशनल बैंडविड्थ के लिए गेटवे का काम करता है।

नए केबल सिस्टम भारत के पूर्वी तट पर लग रहे हैं, और इससे मुंबई साइट पर भीड़ कम करने में मदद मिलेगी। इस नेटवर्क में हिस्सा लेने वाले घरेलू खिलाड़ियों में कुछ जानी-मानी टेलीकॉम कंपनियां शामिल हैं- टाटा कम्युनिकेशंस, भारती एयरटेल, रिलायंस जियो, सिफी टेक्नोलॉजीज़, और BSNL वगैरह।

केबल मरम्मत के काम में भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। भारतीय समुद्री क्षेत्र में सिर्फ़ दो मेंटनेंस प्रोवाइडर सर्विस देते हैं, जो सिंगापुर और दुबई में हैं, और सबसे नज़दीकी केबल डिपो (स्पेयर केबल के लिए स्टोरेज स्पेस) श्रीलंका के गॉल में है।

क्वाड का मूल्यांकन

केबल सिस्टम के अलग-अलग देशों के अधिकार क्षेत्रों में फैले होने की वजह से, तकनीकी क्षमता विकसित करने के लिए आपसी साझेदारियों की ज़रूरत होगी। इस मामले में सब-सी केबलों को प्राथमिकता देने की सबसे साफ़ कोशिश 'क्वाड' की तरफ से देखने को मिली है। सब-सी केबलों के साथ इस समूह का जुड़ाव काफ़ी कुछ हिंद-प्रशांत केबल इकोसिस्टम में चीन की बढ़ती भूमिका को लेकर साझा चिंताओं की वजह से हुआ है, ना सिर्फ़ बाज़ार हिस्सेदारी बल्कि तेज़ी से उभरती क्षमताओं के मामले में भी। इसके जवाब में, क्वाड ने 2023 में 'पार्टनरशिप फॉर केबल कनेक्टिविटी एंड रेज़िलिएंस' नाम से एक साझेदारी शुरू की। यह इस बात का सबूत है कि सभी सदस्य देश सब-सी इंफ्रास्ट्रक्चर को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। तब से लेकर, क्वाड की कोशिशों से कई ऐसी पहलें हुई हैं जो इस साझा चिंता को दिखाती हैं। इनमें 2024 में केबल रेज़िलिएंस और सिक्योरिटी को लेकर न्यूयॉर्क प्रिंसिपल्स तय किए जाना, और ऑस्ट्रेलिया में एक कनेक्टिविटी और रेज़िलिएंस सेंटर बनाना शामिल है, जो प्रशांत महासागर क्षेत्र में नए केबल प्रोजेक्ट्स की मदद करता है। एक और बड़ी मिसाल माइक्रोनेशिया-किरिबाती-नाउरू केबल है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से इस केबल का काम साल 2025 में पूरा हुआ। इसके साथ ही, ऑस्ट्रेलिया जैसे सदस्य देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय केबल नेटवर्क के लिए फंड बढ़ा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, साल 2025 में हुए 'यू.एस.-इंडिया वेव्स फोरम' जैसे नीतिगत संवादों ने सब-सी केबलों के रणनीतिक महत्व पर आपसी सहमति को और मजबूत किया है। क्वाड के सभी दस्तावेजों में सब-सी केबल हमेशा से एक अहम मुद्दा रहा है, यहां तक कि विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद जारी हुए हालिया संयुक्त बयान में भी इसे प्राथमिकता दी गई है।

हालांकि, ज़्यादातर ठोस प्रगति पूरे क्वाड समूह के बजाय द्विपक्षीय या त्रिपक्षीय समझौतों में नज़र आती है। भले ही इस समस्या पर समूह के सभी देशों की राय एक जैसी है, लेकिन भागीदारी में सबकी बराबरी न होने की वजह से इस ग्रुप की सामूहिक क्षमता पर सवाल उठते रहते हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में जब डिजिटल वर्ल्ड में अंडरसी केबलों की सुरक्षा और मजबूती पर आधारित न्यूयॉर्क प्रिंसिपल्स तय किए गए, तो क्वाड के बाकी सभी देशों ने इसका समर्थन किया, लेकिन भारत इसके शुरुआती समर्थकों में शामिल नहीं था। लेकिन भारत ने फरवरी 2025 में अमेरिका के साथ एक अलग साझा बयान जारी कर केबल मरम्मत की क्षमता को ज़रूरी माना। नीचे दिए गए कारणों से यह समझा जा सकता है कि साझा हित होने के बावजूद, चारों देशों के बीच मिलकर काम करने वाले एक बड़े क्वाड फ्रेमवर्क की कमी क्यों दिख रही है।

पहली बात तो यह है कि भले ही चारों देश सब-सी इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरे भारत-प्रशांत क्षेत्र के नज़रिए से देखते हैं, लेकिन ज़मीन पर काम करने का तरीका हर जगह काफी अलग और स्थानीय है। जैसे, केबल मरम्मत के काम को ले लीजिए, जो इस ग्रुप के लिए प्राथमिकता वाला काम रहा है। केबल मरम्मत का काम ऐसा है जिसे तुरंत करना होता है, लेकिन इसमें भौगोलिक स्थिति और दूरी की रुकावटें आती हैं। यहां तक कि तुलनात्मक रूप से नज़दीकी मामलों में, जैसे सिंगापुर भारत के पास खराब हुई केबल को ठीक करने के लिए जहाज़ भेजता है, तब भी उसे पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं। इसलिए, क्वॉड देशों के आपस में दूर-दूर होने की वजह से, केबल मरम्मत के लिए कोई सार्थक तालमेल बिठाना एक चुनौती हो सकता है।

दूसरी और ज़्यादा ज़रूरी बड़ी बात यह है कि क्वॉड सदस्यों की क्षमताओं में काफी अंतर है। अमेरिका और जापान में 'सबकॉम' और 'एनईसी' जैसी दमदार कंपनियां हैं, और ये दोनों मिलकर पूरी दुनिया में केबल बिछाने और उनकी देखभाल करने का एक बहुत बड़ा हिस्सा संभालती हैं। दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया ने समुद्री केबलों के लिए एक मॉडल रेगुलेटरी और फाइनेंसिंग फ्रेमवर्क तैयार किया है, और प्रशांत महासागर में कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में सीधा निवेश करके इसे दिखाया भी है। इसके उलट, भारत की इस इंडस्ट्री में अभी हिस्सेदारी सीमित है। इसका नतीजा यह है कि क्वॉड के बीच असल काम द्विपक्षीय या त्रिपक्षीय समझौतों के जरिए होता है।

और आखिरी बात यह है कि सब-सी केबल जैसे क्षेत्रों में सहयोग के लिए लंबे समय तक टिकने वाली साझेदारी की ज़रूरत होती है। अलग-अलग सदस्य देशों की नीतियों और प्राथमिकताओं में अंतर- जैसे कि पैसे देने या कई देशों के साथ मिलकर काम करने को लेकर- इस पूरे ग्रुप की संभावनाओं पर थोड़ी अनिश्चितता डाल सकता है।

भारत को क्या करना चाहिए?

केबल सिस्टम को हमेशा एक बैकअप की ज़रूरत होती है। यही बात देशों के बीच सहयोग के तरीकों पर भी लागू होती है। भारत को अपने मौजूदा साझेदारों के साथ काम जारी रखने के साथ-साथ, ऐसे नए विकल्प भी तलाशने चाहिए जो न सिर्फ समान हितों पर टिके हों, बल्कि भौगोलिक रूप से भी तार्किक हों। भारत को इस इलाके में एक-दूसरे की कमियों को पूरा करने वाली भौगोलिक स्थिति और कनेक्टिविटी में साझा हित के आधार पर पार्टनर ढूंढ़ने से फायदा हो सकता है। भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया एक संभावित विकल्प हो सकता है, जिसके पास समुद्री केबल प्रोजेक्ट्स को पैसा देने और उनके लिए कानून बनाने का अच्छा अनुभव है। ऑस्ट्रेलिया पहले से ही प्रशांत महासागर क्षेत्र में केबल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक अहम भूमिका निभा रहा है। दोनों देशों के बीच तकनीकी और कानूनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए 'ऑस्ट्रेलिया-इंडिया साइबर एंड क्रिटिकल टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप (AICCTP)' एक मजबूत आधार का काम कर सकती है। अफ्रीकी देश भी फायदेमंद साझेदार हो सकते हैं, क्योंकि भारत और अफ्रीका दोनों ही क्षेत्रों में डेटा की मांग और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर तेज़ी से बढ़ रहा है। हिंद महासागर से गुजरने वाला रूटिंग कॉरिडोर दोनों पक्षों के काम आने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में मिलकर निवेश करने के नए मौके बना सकता है। पश्चिम एशिया में, ओमान और सऊदी अरब डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में जमकर निवेश कर रहे हैं और खुद को एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाले हब के रूप में तैयार कर रहे हैं, जिससे वे भी भारत के संभावित महत्वपूर्ण सहयोगी बन जाते हैं।

सब-सी केबल्स का रणनीतिक महत्व आगे चलकर और ज़्यादा बढ़ेगा। जैसे-जैसे दुनिया भर के केबल नेटवर्कों को बिछाने और उनके रास्तों को तय करने के वित्तीय तर्कों में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है, भारत को इस मौके का फायदा उठाते हुए अपने क्षेत्र में इस इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को अपने हिसाब से प्रभावित करना चाहिए।

 

इस लेख का अनुवाद धीरज कुमार (फ्रीलांस, कार्नेगी इंडिया) ने किया है।

लेखक के बारे में

चारुकेशी भट्ट

रिसर्च एनालिस्ट, टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी प्रोग्राम

चारुकेशी भट्ट कार्नेगी इंडिया में एक रिसर्च एनालिस्ट हैं, जहां उनके काम का फ़ोकस उभरती प्रौद्योगिकियों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के आपसी रिश्तों पर है।

चारुकेशी भट्ट
रिसर्च एनालिस्ट, टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी प्रोग्राम
चारुकेशी भट्ट
भारतप्रौद्योगिकी

कार्नेगी सार्वजनिक नीति मुद्दों पर संस्थागत पद नहीं लेता; यहाँ व्यक्त विचार लेखक(ओं) के हैं और जरूरी नहीं कि वे कार्नेगी, उसके कर्मचारियों या ट्रस्टियों के विचारों को दर्शाते हों।

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