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ऑपरेशन सिंदूर के सैन्य सबक

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लेख
Carnegie India

ऑपरेशन सिंदूर के सैन्य सबक

इस लेख में ऑपरेशन सिंदूर से मिले मुख्य सबकों की चर्चा की गई है और और दिखाया गया है कि भारत की तैयारियों ने इसके नतीजों पर कैसे असर डाला और भविष्य की तैयारी को मज़बूत करने के लिए और क्या करना ज़रूरी है।

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द्वारा दिनाकर पेरी
पर प्रकाशित 11 नव॰ 2025
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परियोजना

सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम

सिक्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा में भारत की तेज़ी से विकसित होती भूमिका पर जटिल समीकरण असर डालते हैं। सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम के विशेषज्ञ इस विश्व व्यवस्था में भारत की हैसियत की समीक्षा इसकी विदेश और सुरक्षा नीतियों के विश्लेषणों के माध्यम से करते हैं, जिसमें खास तौर पर ध्यान चीन के साथ संबंध, सीमाओं की सुरक्षा और हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति पर दिया जाता है।

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भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 26 अगस्त 2025 को युद्ध के बदलते स्वरूप पर अपनी राय रखते हुए कहा, “राष्ट्रों और सरकारों के बीच अब ताक़त के इस्तेमाल की तरफ झुकाव बढ़ गया है, क्योंकि आजकल राजनीतिक मकसद छोटे-छोटे संघर्षों के ज़रिए पूरे हो सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “सटीक हमलों से बहुत कम अतिरिक्त नुकसान होता है, इसलिए देशों के लिए युद्ध की लागत भी कम रहती है।”

यह बात भारत के सैन्य रुख को अच्छी तरह समझाती है, जो ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे पर की गई कार्रवाई में दिखा। यह कार्रवाई अप्रैल 2025 में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में थी, जिसमें छब्बीस नागरिक मारे गए थे। यह ऑपरेशन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद से पाकिस्तानी ठिकानों पर भारत का शायद सबसे महत्वपूर्ण और साहसिक सैन्य हमला है।

6 मई से 10 मई 2025 के बीच चले इस पांच दिन के संघर्ष से कई सैन्य सबक मिले। इनमें वे पहलू शामिल हैं जिनके बेहद सकारात्मक नतीजे मिले, लेकिन उनमें वे बातें भी हैं जिन पर भविष्य की तैयारी के लिए ध्यान देने की ज़रूरत है। इस लेख में ऑपरेशन सिंदूर से मिले मुख्य सबकों की चर्चा की गई है और और दिखाया गया है कि भारत की तैयारियों ने इसके नतीजों पर कैसे असर डाला और भविष्य की तैयारी को मज़बूत करने के लिए और क्या करना ज़रूरी है।

मुख्य निष्कर्ष

●     स्पष्ट उद्देश्य तय करने से सज़ा देने के लिए जवाबी कार्रवाई को सीमित स्तर तक रखने की गुंजाइश बनती है।

●     हवाई ताक़त, जिसे पहले लड़ाई का दायरा बढ़ाने वाला कदम माना जाता था, अब सामान्य हो गई है। लंबी दूरी तक मार करने वाले सटीक हथियारों के साथ मिलकर हवाई ताक़त परमाणु ख़तरे की सीमा के भीतर असरदार विकल्प पेश करती है।

●     1971 के बाद पहली बार, भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर गैर-बराबरी साफ़ तौर पर स्थापित हुई है। चीन, पाकिस्तान को अपनी मदद के ज़रिए, पिछले दरवाज़े से, लगातार अपना दखल बढ़ा रहा है।

●     ये छोटा लेकिन गंभीर संघर्ष इस बात को दर्शाता है कि लगातार खुफ़िया जानकारी, निगरानी और टोही गतिविधियों (ISR) की ज़रूरत कितनी अहम है। इससे भी ज़्यादा जरूरी है अलग-अलग प्लेटफॉर्मों को जोड़ने का नेटवर्क, जिस तरह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एकीकृत वायु रक्षा प्रणाली ने खुद को असरदार साबित किया।

●     संघर्ष के दौरान जिन सैन्य क्षमताओं ने सबसे ज़्यादा असर डाला, वे लंबी विकास प्रक्रिया से गुज़री थीं — जैसे सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ब्रह्मोस और उसका सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के साथ सामंजस्य।

●     आधुनिकीकरण के क्षेत्र में कुछ देरी छिपा हुआ वरदान साबित हुई, जैसे पुरानी वायु रक्षा तोपें, जिन्होंने छोटे ड्रोन से मुकाबले के लिए सस्ता और असरदार समाधान पेश किया।

●     हाल के संघर्षों ने सबसे ताज़ा लड़ाई की तैयारी में बेहतर मज़बूती सुनिश्चित की है। आपातकालीन खरीद पसंदीदा तरीका बन गई है क्योंकि नियमित खरीद प्रक्रिया अब भी जटिल बनी हुई है। शायद यही सबसे बड़ा सबक है।

●     और, अंत में, भारतीय सशस्त्र बलों ने मिलकर कार्रवाई करने का एक उच्च स्तर हासिल किया है। यह लगातार चलने वाली एक प्रक्रिया है, जिसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति, केंद्रीकृत योजना और विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन ने साथ मिलकर रफ्तार दी है।

संघर्ष को बढ़ने से रोकना

ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत के हमले भारत की राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रतीक हैं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “न्यू नॉर्मल” कहा है। अब आतंकवादियों और उन्हें समर्थन देने वाले देशों के बीच कोई फर्क नहीं किया जाएगा। यह दो खासियतों—इरादा और क्षमता—को दिखाता है, जिनमें से एक या दोनों की बीते हुए वक्त में कमी थी।

जुलाई 2025 में जनरल अनिल चौहान के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने पारंपरिक सैन्य अभियानों के लिए काफ़ी गुंजाइश बनाई। उन्होंने इसकी तीन बड़ी वजहें बताईं—परमाणु हथियारों पर भारत की ‘पहला इस्तेमाल नहीं’ नीति; पाकिस्तान का भारतीय सैन्य ठिकानों पर पहले हमला करना, जिससे संघर्ष को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उसी पर आ गई; और भारत के हमले केवल आतंकवादी ढांचों पर केंद्रित थे और किसी इलाके पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की गई। उन्होंने कहा कि भविष्य में पारंपरिक अभियानों की यह गुंजाइश और भी बढ़ सकती है।

लंबी दूरी तक मार करने वाले सटीक मार्गदर्शित हथियारों और उनका इस्तेमाल करने की तकनीकी क्षमता ने भारत के विकल्पों को ज़्यादा मज़बूत किया है और उनका दायरा बढ़ाया है। 2001 में संसद पर आतंकवादी हमले, 2008 के मुंबई हमले और 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारत और पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों के बीच नियंत्रण रेखा पर हुई करीबी हवाई भिड़ंत के समय भारत के पास इन क्षमताओं की कमी महसूस की गई थी।

उसके बाद के छह सालों में, इस इलाके में सैन्य क्षमता को ‘बियॉन्ड विज़ुअल रेंज’ यानी नज़र से परे युद्ध प्रणाली की तरफ़ बढ़ाया गया है, जिसमें सटीक हमलों के लिए तकनीकी सहयोग और फोर्स मल्टीप्लायर्स की भूमिका प्रमुख रही है। यह बदलाव 2019 के संघर्ष, 2020 से चीन के साथ चल रहे गतिरोध और यूक्रेन युद्ध से मिले सबकों से प्रेरित है, जिसने आधुनिक युद्धक्षेत्र की तस्वीर ही बदल दी है। ड्रोन, लोइटरिंग हथियारों और दूसरी नई तकनीकों ने युद्ध के तौर-तरीकों को बदल दिया है, और लंबी दूरी की मारक क्षमता अब एक बड़ी खासियत बनकर उभरी है। भारत ने इन सबक़ों को समझकर अपनी कमियों को दूर करने के लिए तेज़ी से कदम उठाए।

सैन्य स्तर पर गैर-बराबरी स्थापित

पांच दिनों में, भारत ने पूरी तरह से सैन्य प्रभुत्व बना लिया था, जिसे बाद में जारी की गई हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरों, ज़मीन से लिए गए वीडियो और मानवरहित हवाई जहाज़ों (UAV) से ली गई फुटेज के आधार पर नुकसान के बाद के आकलन ने पुख़्ता किया। 6 और 7 मई 2025 की आधी रात को हुए शुरुआती हमलों में आतंकवादी ढांचों और नौ प्रशिक्षण शिविरों को निशाना बनाया गया। कुछ रिपोर्टों और संघर्ष के कुछ हफ्तों बाद दो सैन्य अधिकारियों की बातचीत के मुताबिक, उस दौरान दोनों पक्षों के करीब 125 लड़ाकू विमान सीमा पर तैनात थे। ये हाल के समय का सबसे बड़ा हवाई संघर्ष माना जा रहा है जिसमें चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान शामिल थे। भारत को "शुरुआती नुकसान" हुआ था, जिसे काफ़ी बाद में स्वीकार किया गया, हालांकि सही आंकड़े अभी तक सामने नहीं आए हैं।

जब पाकिस्तान ने भारतीय सैन्य और नागरिक ठिकानों पर पलटवार किया, तो भारत ने अगले कुछ दिनों में जवाबी कार्रवाई तेज़ कर दी। हवाई रक्षा प्रणाली, कमांड और कंट्रोल सेंटर, और प्रमुख हवाई क्षेत्र तबाह कर दिए गए और भारत ने कम से कम पांच पाकिस्तानी जेट और एक शुरुआती चेतावनी विमान को मार गिराया। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कुछ खास प्लेटफॉर्म और एकतरफा किस्सों पर ज़ोर देने की वजह से भारतीय जीत पर संदेह के बादल छाए, और आंशिक रूप से, भारतीय पक्ष की जानकारी साझा करने में देरी तथा नुकसान पर गैर-ज़रूरी चुप्पी ने इस भ्रम को और बढ़ाया।

‘विज़िबिलिटी’ इस संघर्ष का अहम पहलू रही, जो 2019 से सीखा गया सबक था। भारतीय वायुसेना के उप-प्रमुख एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी के मुताबिक, सेना को निर्देश दिए गए थे कि कार्रवाई ‘स्पष्ट और दिखाई देने वाली’ होनी चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि एक बार युद्ध शुरू होने के बाद उसे खत्म करने की कुंजी ‘स्पष्ट रूप से परिभाषित उद्देश्य’ रखना है। इसे हासिल करने के लिए पचास से भी कम हथियारों का इस्तेमाल किया गया।

भविष्य के किसी भी भारत-पाकिस्तान संकट में चीन की भूमिका को ध्यान में रखना होगा। सेना के उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह के मुताबिक, सीधी टक्कर भले ही पाकिस्तान के साथ थी, लेकिन उसे चीन और तुर्किये का समर्थन हासिल था। फिलहाल भारत-चीन संबंधों में सुधार दिख रहा है, लेकिन सीमा पर तनाव एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है।

ये भी देखा गया कि अलग-अलग ही सही, दोनों पक्षों ने संघर्ष को बड़ी सावधानी से नियंत्रित किया और परमाणु हमले के संकेत पिछले संघर्षों की तुलना में काफ़ी कम रहे।

हाल के संघर्षों ने क्षमताओं की कमी दूर की

लंबे समय की क्षमता विकास योजनाएं और आधुनिकीकरण की कोशिशें जटिल रक्षा खरीद प्रक्रियाओं की वजह से रुकी हुई हैं। इस पृष्ठभूमि में 2016, 2019 और 2020 में भारत को झेलने पड़े संघर्ष और यूक्रेन युद्ध ऐसे झटके थे, जिन्होंने रक्षा व्यवस्था को झकझोर दिया। इन घटनाओं ने बड़े पैमाने पर स्पेयर पार्ट्स, उपकरण और गोला-बारूद के भंडारण को बढ़ावा दिया और साथ ही ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, लोइटरिंग म्यूनिशन, मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPAD) और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसी नई तकनीकों को जल्दी शामिल करने की प्रक्रिया को तेज़ किया। पिछले कुछ वर्षों में हर संघर्ष ने अगले संभावित संकट के लिए एक सुरक्षा कवच का काम किया।

मिसाल के लिए, 2016 में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सशस्त्र बलों ने गोला-बारूद का पर्याप्त भंडार जमा किया, जिसकी लंबे समय से कमी महसूस हो रही थी। 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भी यही कोशिश जारी रही और जब पूर्वी लद्दाख में हिमालय की बर्फ़ीली ऊंचाइयों पर चीन के साथ गतिरोध शुरू हुआ, तब यह तैयारी बेहद उपयोगी साबित हुई। यह गतिरोध भारत-चीन संबंधों में एक अहम मोड़ था, जिसने भारतीय सशस्त्र बलों को उत्तरी मोर्चे पर नए सिरे से बुनियादी क्षमता विकास के लिए प्रेरित किया। अगले दो वर्षों में भारतीय सेना ने अपने हथियार, मारक क्षमता और सहयोगी इकाइयों का विस्तार किया।

जब फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तब भारत को दोनों पक्षों से चुनौती का सामना करना पड़ा क्योंकि उसके मिलिट्री हार्डवेयर रूस और यूक्रेन, दोनों से आते हैं। पिछले कुछ सालों में बनाए गए भंडार ने तैयारियों को लगे झटके को झेलने में मदद की, हालांकि इस झटके का असर अब तक महसूस हो रहा था। सशस्त्र बलों ने देशी उद्योगों से छोटे स्पेयर पार्ट्स और कल-पुर्जों की सप्लाई के लिए संपर्क भी बढ़ाया, जिसके अच्छे नतीजे आखिरकार सामने आए।

आपातकालीन खरीद से हुआ बचाव

इस पूरी कोशिश में आपातकालीन खरीद (Emergency Procurement - EP) उम्मीद की एक किरण बनकर उभरी, साथ ही सेना के विभिन्न स्तरों पर वित्तीय शक्तियों में बढ़ोतरी भी हुई। भारत के रक्षा मंत्रालय ने 2016 में उरी आतंकवादी हमले के ठीक बाद EP प्रक्रिया को मंजूरी दी थी, जबकि सामान्य खरीद प्रक्रिया बहुत धीमी थी। ‘पूर्वी लद्दाख/उत्तरी सीमाओं पर परिस्थितियों का असरदार ढंग से तुरंत जवाब देने के लिए ऑपरेशनल ज़रूरतों’ को पूरा करने के मकसद से EP की ताक़त सर्विस हेडक्वॉर्टर्स को सौंपी गई।

EP प्रावधानों के अनुसार, भारतीय सशस्त्र बल तत्काल आधार पर 300 करोड़ रुपये (लगभग 36 मिलियन डॉलर) तक की हथियार प्रणाली, जिनमें पूरी प्रणाली भी शामिल है, खरीद सकते हैं, और इन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत होने के एक साल के भीतर हासिल कर लिया जाना होता है। 2016 से अब तक रक्षा मंत्रालय ने सशस्त्र बलों के लिए EP की छह किश्तों को मंजूरी दी है—EP-2 बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019) के बाद, EP-3 चीन के साथ 2020 के गतिरोध के दौरान, EP-4 को 2022 में ‘महत्वपूर्ण क्षमता की कमी’ दूर करने के लिए चीन पर केंद्रित रखा गया, EP-5 को 2024 के अंत में आतंकवाद विरोधी उपकरणों पर केंद्रित किया गया, और EP-6 को ऑपरेशन सिंदूर के तहत सारी सैन्य कार्रवाई बंद होने के कुछ ही दिनों बाद मंजूरी दी गई, जिसमें 40,000 करोड़ रुपये (लगभग 4.8 अरब डॉलर) तक के स्टॉक को फिर से भरने पर ध्यान दिया गया।

सशस्त्र बलों ने उन प्रणालियों को भी खरीदा जो नियमित प्रक्रिया में सालों से अटकी थीं, भले ही उनकी मात्रा छोटी थी। जैसे, रूस से एक बड़े सौदे में चुने गए इग्ला-एस मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPAD) पर सौदा दस साल से भी ज़्यादा वक्त से अटका हुआ था। सेना ने आखिरकार EP-2 के तहत इग्ला-एस लॉन्चर और मिसाइलें खरीदीं और बाद में EP-4 के तहत और ज़्यादा इग्ला-एस मिसाइलें हासिल कीं।

क्षमता विकास बार-बार होने वाली प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान प्रमुख घरेलू क्षमताएं युद्ध में असरदार साबित हुईं, जिनमें रूस के साथ संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें; आकाश एयर डिफेंस  सिस्टम; और मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।

हवा से प्रक्षेपित ब्रह्मोस एक गेमचेंजर की तरह सामने आया। इसका सामंजस्य सुखोई-30 जेट के साथ बैठाने का काम 2013 में शुरू हुआ। रूस ने इस प्रोजेक्ट का जिम्मा 20 करोड़ डॉलर (लगभग 1,300 करोड़ रुपये) में लेने की पेशकश की।  ऊंची लागत के कारण, इसे घरेलू स्तर पर करीब 96 लाख डॉलर (80 करोड़ रुपये) में पूरा किया गया। नवंबर 2017 में पहला परीक्षण करने में चार साल लगे। इसके बाद, 2.5 टन वज़नी ब्रह्मोस को ले जाने के लिए चालीस सुखोई-30 एमकेआई में ज़रूरी बदलाव किए गए।

लेयर्ड एयर डिफेंस (AD) नेटवर्क एक और मिसाल है जहां वक्त के साथ क्षमताओं का विकास हुआ। इसकी मज़बूती तब साबित हुई जब भारतीय सेना और वायुसेना के नेटवर्क ने पाकिस्तान से ड्रोन के हमलों को नाकाम करने के लिए तालमेल से काम किया—एक समय तो भारत के पश्चिमी मोर्चे पर एक साथ 600 से ज़्यादा मिसाइलें दागी गईं।

भारतीय सेना के एयर डिफेंस सिस्टम आकाशतीर सिस्टम से जुड़े हैं जो भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जुड़ा है। यह अपने सभी सिस्टम—आकाश, इज़राइली स्पाइडर, मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM), और रूसी S-400 ट्रायम्फ लॉन्ग रेंज एडी सिस्टम—को रडार और कमांड कंट्रोल सिस्टम की मदद से एक जगह पर लाकर भारत के एयरस्पेस की चौबीसों घंटे तस्वीर तैयार करता है।

पाकिस्तान की तरफ से दागे गए ज़्यादातर प्रोजेक्टाइल छोटे ड्रोन थे, जिनका मुख्य इरादा एयर डिफेंस नेटवर्क को व्यस्त रखना और भारतीय सुरक्षा प्रणाली का अंदाज़ लगाना था। इनके साथ कुछ कामिकेज़ ड्रोन, मिसाइलें और लड़ाकू जेट के हथियार भी थे। छोटे ड्रोन और क्वाडकॉप्टर के लिए, भारतीय सेना के एयर डिफेंस ने हार्ड- और सॉफ्ट-किल गन और दूसरे काउंटर- ड्रोन सिस्टम तैनात किए, और उनमें से ज़्यादातर को मार गिराया गया। इनमें एल-70 और ज़ू-23 गन, पेचोरा और OSA-AK जैसे युद्ध में असरदार ड्रोन सिस्टम शामिल हैं, जिन्हें कुछ समय से बदले जाने का इंतज़ार था।

सेना की पुरानी एयर डिफेंस तोपें, जो खरीद में देरी की वजह से सेवा में बनी हुई थीं, उन्हें ड्रोन के नए खतरे से निपटने के बाद नई ज़िंदगी मिल गई है। नए ऑप्टिकल साइट, मोटर और एयर बर्स्ट एम्युनिशन राउंड के साथ सही ढंग से अपग्रेड की गईं, ये तोपें किफ़ायती थीं और छोटे ड्रोन के खिलाफ असरदार साबित हुईं। ड्रोन का खतरा सेना के एयर डिफेंस द्वारा सीखे गए प्रमुख सबकों में से एक था, जो उन्होंने यूक्रेन युद्ध से सीखा।

आगे का रास्ता

जहां एक युद्ध सीमाएं तय करता है, वहीं यह मौजूदा क्षमताओं को भी सबके सामने ले आता है। पाकिस्तान को भारत की मौजूदा ताक़त और कमज़ोरियों की अच्छी जानकारी मिल गई है। अब वह चीन से और ज़्यादा एडवांस्ड हथियार हासिल करके संतुलन बनाने की कोशिश करेगा, जो पहले से ही उसके सैन्य आयात का बड़ा हिस्सा भेजता है। ऐसी ख़बरें आई हैं कि पाकिस्तान चालीस J-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान, HQ-19 एयर डिफेंस सिस्टम और KJ-500 एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट खरीदने की सोच रहा है। पाकिस्तान, भारत की क्षमताओं के अपने अंदाज को चीन के साथ भी साझा कर सकता है, जो भारत के लिए एक बड़ा खतरा है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है। पहली, जहां बढ़त है, वहां उसे बनाए रखना; और दूसरा, सामने आई कमियों को पूरा करना।

भारत को रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) को बेहतर करना होगा ताकि यह पक्का हो सके कि क्षमता विकास एक तय समय सीमा में हासिल हो। DAP 2020 की फिलहाल एक व्यापक समीक्षा हो रही है जिसका घोषित उद्देश्य "कामकाज की ज़रूरतों और आधुनिकीकरण" को "समयबद्ध तरीके से" पूरा करना है। कामकाज के नज़रिए से, नेटवर्किंग और सेंसर फ्यूज़न को सबसे बड़ी प्राथमिकता देनी चाहिए। भारतीय वायुसेना अलग-अलग देशों के एयरक्राफ्ट के बेड़े और सिस्टम का संचालन करती है, जिसे बेरोकटोक ऑपरेशन के लिए रियल टाइम कम्युनिकेशन की ज़रूरत होती है। जैसे, भारत MBDA के बनाए गए मेटियोर बीवीआर मिसाइल को भारत के स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस के साथ इंटीग्रेट करने का इच्छुक था। हालांकि, MBDA ने शर्त रखी थी कि ऐसा तभी किया जा सकता है जब जेट पर भारतीय या यूरोपीय रडार का इस्तेमाल किया जाए क्योंकि इंटीग्रेशन का मतलब होगा संवेदनशील जानकारियां एक-दूसरे को देना। 2018 में एयरक्राफ्ट के लिए एक इज़राइली रडार को चुने जाने के बाद ये प्रोजेक्ट नाकाम हो गया।

एयर मार्शल तिवारी चेतावनी देते हैं कि भविष्य के युद्ध बीते वक्त के युद्धों से अलग होंगे क्योंकि दुश्मन अपने तरीके से जवाब देंगे। ऑपरेशन सिंदूर ने भारत और पाकिस्तान के बीच पारंपरिक स्तर पर एक साफ़ अंतर स्थापित कर दिया है, लेकिन जैसा कि भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है, यह मान लेना नासमझी होगी कि इससे सीमा पार आतंकवाद का अंत हो जाएगा। इस ऑपरेशन ने एक बहुत ऊंचा प्रतिरोधक स्तर बना लिया है, हालांकि इसके साथ ही यह अनिश्चितता भी आई है कि अगली भिड़ंत कैसी होगी। 

यह लेख धीरज कुमार द्वारा अनूदित किया गया है।

दिनाकर पेरी
फ़ेलो, सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम
दिनाकर  पेरी
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